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आज मनाएं 'खुशियों की दीपावली', शुभ मुहूर्त के साथ जानें पूजन विधि और मंत्र  

Wed, 07 Nov 2018 02:22 PM IST
राहुल शुक्ला, अमर उजाला, कानपुर

सार

 दीपावली का पूजन दोपहर 12 से रात 7:32 बजे तक
-दीपावली की पूजन अमावस्या और स्वाती नक्षत्र में ही किया जाता है
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दीपावली की पूजा हमेशा स्वाती नक्षत्र में होती है। इस बार अमावस्या तो बुधवार की रात 9 बजे तक है लेकिन स्वाती नक्षत्र रात 7:32 बजे तक ही है। ऐसे में दीपावली की पूजा लोग अपने घरों और प्रतिष्ठानों में दोपहर 12 बजे के बाद से रात 7:32 बजे तक ही करें। कारण है कि 7:32 बजे के बाद विशाखा नक्षत्र लग जाएगा।
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इंडियन कॉउसिंल ऑफ एस्ट्रोलॉजिकल साइंसेज (रजि.) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं चितंक इंस्टीट्यूट ऑफ वैदिक साइंसेज के संस्थापक रमेश चिंतक  दीपावली मूलत: यमराज का पर्व है। 5 दिन का यह यम पर्व कहलाता है। मृत्यु पर विजय प्राप्त करने के लिए देव और असुरों ने समुद्र मंथन किया। उसमें 14 रत्न निकले। जिसमें विष और अमृत, रंभा और महालक्ष्मी का प्रादुर्भाव हुआ।
 
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धनतेरस, नरक चतुर्दशी के बाद तीसरे दिन का पर्व दीपावली है। इसमें प्रदोष काल में दीप और महालक्ष्मी के पूजन का विधान है। इसमें बसना पूजन, संस्थान में पूजन और घर में पूजन विशेष रूप से होता है। दीपावली का मुहूर्त दोपहर 12 बजे के बाद से रात 7:32 बजे तक ही है। कारण है कि इसके बाद विशाखा नक्षत्र लग जाएगा।
 

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पद्मेश इंस्टीट्यूट ऑफ वैदिक साइंसेज के संस्थापक पंडित केए दुबे पद्मेश ने बताया कि इस बार बार प्रदोष काल शाम 5:14 से रात 7:50 बजे तक है। इसमें ही शाम 5:41 से रात 7:37 बजे के मध्य वृष लग्न रहेगी। इस काल खंड में गणेश-लक्ष्मी, कुबेर और इंद्र को पूजन करते है।
 
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पांचवां दीपक यमराज के लिए निकालते है और यह पांचों दीपक घी के ही प्रज्जवलित किए जाते हैं। चौघड़िया मुहूर्त के अनुसार शाम 6:51 से रात 11:42 बजे तक शुभ, अमृत चर की चौघड़िया रहेगी। पूजन के लिए यह कालखंड भी उत्तम है। जो लोग साधक है उन्हें महानिशीथकाल में पूजन करना होता है। इस बार रात 12:04 से 12:24 बजे तक महानिशीथकाल है। सिंह लग्न में पूजन का समय रात 12:09 से रात 2:23 बजे तक रहेगा।
 
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अन्नकूट महोत्सव
दीपावली के अगले दिन गुरुवार को गोवर्धन पूजा की जाती है। इस पूजा की परंपरा श्रीकृष्ण के समय से हो रही है। इस दिन सुबह गाय के गोबर से घर के आंगन में गोवर्धन पर्वत बनाया जाता है। इसके बाद उसे फूल-पत्तों से सजाया जाता है। कहीं-कहीं पर इंद्र और वरुण की भी पूजा की जाती है और कहीं पकवानों का पहाड़ बनाकर उसके बीच में श्रीकृष्ण की मूर्ति रख कर पूजा की जाती है। बृज में इसे मानवाकार रूप में बनाया जाता है। कुछ स्थानों में इसे पर्वताकार रूप में बनाते है।
 
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भाई दूज
दीपावली के दो दिन बाद शुक्रवार को 9 नवंबर को भाई दूज है। इस दिन बहनें भाइयों के माथे पर टीका करती है और इसके बाद उन्हें मिष्ठान खिलाती है। यम द्वितीया के दिन यम की बहन यमुना नदी में स्नान करने से पूर्र साल भर अकाल मृत्यु की भय से यमराज मुक्त करते है। आज ही के दिन अपने भाई के दीर्घायु होने के लिए उसके माथे पर टीका करते है और यमराज से प्रार्थना करते है कि मेरे भाई के घर अकाल मृत्यु न हो ऐसा हमारे ग्रंथों में उल्लेख है।
 

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नूतन विक्रम वर्ष
दीपावली के अगले दिन यानी कार्तिक शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा ही विक्रम संवत का आरंभ दिवस है। दक्षिण भारत में प्रचलित इस संवत 2072 वर्ष आरंभ होगा। इस दिन वहीं कार्य किए जाते है जो चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को संपन्न होते है।
 

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लक्ष्मीजी का वाहन उल्लू
धार्मिक ग्रंथों से ज्ञात होता है कि सनातन धर्म के सभी देवी-देवताओं ने वाहन के रूप में पशु-पक्षियों का चुनाव किया है। इसके पीछे कई प्रचलित कथाएं हैं। आचार्य विधुशेखर पांडेय ने बताया कि प्राणी जगत की संरचना करने के बाद एक रोज सभी देवी-देवता धरती पर विचरण करने के लिए आए। तब पशु-पक्षियों ने कहा कि हमें वाहन के रूप में चुनें और हमें कृतार्थ करें। तब लक्ष्मीजी असमंजस में पड़ गई किसे अपना वाहन चुनें। लक्ष्मी जब वाहन चुनने में विचार-विमर्श कर रहीं थी तब अन्य पशु-पक्षियों में लड़ाई होने लगीं।
 
 

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इस पर लक्ष्मीजी ने सभी को शांत कराया और कहा कि प्रत्येक वर्ष कार्तिक अमावस्या के दिन में पृथ्वी पर विचरण करने आती हूं। उस दिन मैं आप में से किसी एक को अपना वाहन बनाऊंगी। कार्तिक अमावस्या के दिन सभी पशु-पक्षी आंखे बिछाए लक्ष्मीजी की राह निहारने लगे। रात्रि में जैसे ही लक्ष्मीजी धरती पर पधारी उल्लू ने अंधेरे में अपनी नजरों से उन्हें देख लिया और उनके समीप पहुंच गया। इसके बाद प्रार्थना कि आप मुझे अपना वाहन स्वीकार करें। तब लक्ष्मीजी ने खुशी-खुशी उसे अपना वाहन स्वीकार कर लिया।
 
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मां लक्ष्मी को मनाने का दिन है दीपावली
स्नान-सूर्योदय से पहले प्रात:काल में
देवताओं का पूजन-प्रात:काल
पितरों का पूजन-दोपहर के बाद
ब्रह्मणों का भोजन-दोपहर के बाद
दीपदान-सायंकाल
महालक्ष्मी पूजन-प्रदोषकाल
मशाल दर्शन-सायंकाल
दीपमाला प्रज्जवलन-सायंकाल
 
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