विधाओं की सीमा से परे अपनी सृजनात्मक क्षमता से अपने आसपास घट रहे दुनियावी सच को अभिव्यक्त करने वाले प्रसिद्घ साहित्यकार गिरिराज किशोर के आखिरी वक्त भी उनका परिवार उनके साथ रहा।
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पद्मश्री गिरिराज किशोर को श्रद्धांजलि देते डीएम कानपुर
- फोटो : अमर उजाला
उनके पुत्र अनीश ने बताया कि सुबह जब अचानक उनकी तबियत बिगड़ी तो उन्होंने मेरी मां मीरा किशोर और मेरा हाथ जोर से पकड़ लिया, और कुछ देर बाद ही उनकी सांस थम गई। अनीश के मुताबिक तीन दिन पहले जब उनके पैर में फ्रैक्चर हुआ, उसके बाद वह थोड़ा हताश से दिखे।
लेकिन जो लोग भी उनसे मिलने आते थे, उन्हें इस बात का जरा भी एहसास नहीं होने दिया कि वे शारीरिक रूप से तकलीफ में हैं। अपने स्वभाव के अनुसार उस वक्त भी जिन लोगों की बात उन्हें उनके विचार से मेल नहीं खाती थी, बेझिझक मना कर देते।
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पद्मश्री गिरिराज किशोर (फाइल फोटो) एवं उत्तर प्रदेश के पूर्व राज्यपाल विष्णुकांत शास्त्री
- फोटो : अमर उजाला
रविवार की सुबह से लेकर आखिरी सांस लेने तक वह शांत ही रहे। किसी से कोई बात नहीं की। एक बेटी शिवा मुंबई में रहती हैं, वह रविवार की शाम यहां पहुंचीं। दूसरी बेटी जया अपने पति और बच्चों के साथ यहीं पर थीं। पोतियां ईशा, वान्या के अलावा पोता तन्मय भी उनके आखिरी वक्त में साथ रहे।
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पद्मश्री गिरिराज किशोर का पार्थिव शरीर
- फोटो : अमर उजाला
गिरिराज किशोर की जीवन यात्रा 1937 में उप्र के मुजफ्फरनगर में जन्म हुआ। प्राथमिक शिक्षा भी यहीं पर हुई। 1953 में यूपी बोर्ड इलाहाबाद से हाईस्कूल किया 1956 में यूपी बोर्ड इलाहाबाद से इंटरमीडिएट की परीक्षा पास की
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पद्मश्री गिरिराज किशोर का पार्थिव शरीर
- फोटो : अमर उजाला
1960 में इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज मुजफ्फरनगर से मास्टर ऑफ सोशल वर्क की उपाधि। इसके बाद इलाहाबाद में ही दो वर्ष रोजगार अधिकारी और दो वर्ष परीवीक्षा अधिकारी और फिर स्वतंत्र लेखन किया। 1967 में कानपुर आ गए। यहां कानपुर विश्वविद्यालय में सहायक कुल सचिव, उप सचिव और कुल सचिव(रजिस्ट्रार) के रूप में कार्य किया। 1981 में आईआईटी कानपुर में रजिस्ट्रार के तौर पर नियुक्त हुए। आईआईटी रजिस्ट्रार के रूप में उनका कार्यकाल काफी संघर्ष पूर्ण रहा। हिंदी भाषी होने की वजह से यहां के फैकेल्टी से विरोध का सामना करना पड़ा। इस बीच उन्हें पद से हटाया गया। हाईकोर्ट से केस जीतने के बाद दोबारा उन्होंने आईआईटी ज्वॉइन किया। यहीं पर रहकर परिशिष्ट नामक उपन्यास लिखा। आईआईटी में वह 1983 तक रहे।
पद्मश्री गिरिराज किशोर को गंगाजल पिलाते उनके बेटे
- फोटो : अमर उजाला
1983 में आईआईटी में रचनात्मक लेखन एवं प्रकाशन केंद्र के अध्यक्ष के रूप में जिम्मेदारी संभाली। 1997 में वह आईआईटी से सेवानिवृत्त होकर फिर से पूरी तरह लेखन में जुट गए। 2007 में साहित्य के क्षेत्र में अमूल्य योगदान के लिए पद्मश्री से नवाजे गए।