यमुना और बेतवा नदी के संगम किनारे स्थापित मां अंबे के मंदिर का इतिहास पांच सौ साल पुराना है। यह मंदिर मराठा कालीन है, जहां मां अंबे की मूर्ति के साथ ही मां काली और भगवान शंकर की मूर्ति स्थापित है। किसी जमाने में मंदिर के पास ही गांव बसा था जो दोनों नदियों की बाढ़ में उजड़ गया था।
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प्राचीन मंदिर
मुख्यालय से करीब 14 किमी दूर बीहड़ में बसा बड़ागांव, मराठाकालीन मां अंबे मंदिर के कारण पूरे इलाके में विख्यात है। यह गांव यमुना और बेतवा नदी के संगम से कुछ ही किमी दूर बसा है। यमुना नदी के तल से करीब 100 मीटर ऊंचाई में मां अंबे का मंदिर है। यह मंदिर मराठाकाल में चूना और कंकरीट से बनाया गया है। मंदिर में स्थापित मां अंबे और काली की मूर्तियां भी चमत्कारी है।
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बेतवा नदी के किनारे प्राचीन मंदिर
मंदिर के अंदर दोनों देवियों के सामने ही भगवान शंकर की मूर्ति स्थापित है। गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि इस मंदिर का निर्माण मराठाकाल में किया गया था। इसका पांच सौ साल पुराना इतिहास है। मंदिर के आसपास किसी जमाने में आबादी थी। यमुना और बेतवा नदियों की बाढ़ में पूरा गांव डूब गया था, लेकिन मंदिर पूरी तरह से सुरक्षित रहा। गांव के लोग भी बाढ़ के समय मां अंबे की मूर्ति का चमत्कार देख दंग रह गए थे।
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मंदिर
मंदिर के बुजुर्ग पुजारी सुखदेव ऋषि ने बताया कि बाढ़ के कारण मंदिर के आसपास का इलाका पानी में डूब जाने से हर जगह हाहाकार मच गया था। इसीलिए मंदिर से दो किमी दूर नया बड़ागांव बसाया गया। अब यह गांव हर तरह से सुरक्षित है। पुजारी के मुताबिक इस प्राचीन मंदिर में हर साल कार्तिक पूर्णिमा के दिन पूरा गांव मिलकर धार्मिक अनुष्ठान करता है। आठवें दिन गांव के लोगों की मदद से मंदिर में भंडारा होता है।
पुजारी का कहना है कि इस मंदिर में हर किसी की मुराद पूरी होती है। कई लोगों को संतान का सुख मां अंबे की मूर्ति पर माथा टेकने से मिला है। गांव के जयनारायण सिंह यादव ने भी प्रधान रहते हुए मंदिर में सुंदरीकरण के कार्य कराए है। मां अंबे के मंदिर में दो दशक पहले अमौली फतेहपुर से एक व्यापारी आया था। मां की कृपा से उसी रात बिना फिरौती दिए ही उसका पुत्र सकुशल घर पहुंच गया।