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अमर उजाला गांव की लाइव: पीएम चुनने के लिए गांव-कस्बे की राजनीति से अलग सोचते हैं यहां के मतदाता

Sun, 07 Apr 2019 11:47 AM IST
शिखा पांडेय प्रदीप अवस्थी, अमर उजाला, कानपुर
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दोपहर के दो बजे हैं। धूल भरी तेज हवाओं और धूप ने कानपुर में बिधनू कस्बे के लोगों को दुकानों, मकानों में दुबका दिया है। हमेशा जाम से जूझने वाले हाइवे पर सन्नाटा पसरा है। थाने के बगल में चाय की दुकान पर रुके तो अखबार में प्रियंका गांधी की फतेहपुर में होने वाली जनसभा की खबर पर दुकानदार की नजर जमी थी। चाय आर्डर करने के साथ ही पूछ दिया कि दादा वोट किसे देंगे? अधेड़ चाय वाले ने तपाक से जवाब दिया कि यो परधानी का चुनाव न आय, सोच समझि के वोट कीन जई। 

चाय वाले की बात सुनकर उसकी समझ का अहसास हो गया। बाद में उन्होंने मुझे बहुत सारा ज्ञान दिया। बताया कि यह क्षेत्र राजनीति का गढ़ है। प्रधान किसी दल का, सांसद, विधायक किसी और दल का। विधायक तो अक्सर आ जाते हैं, लेकिन सांसद की फोटो अखबारों में या किसी कार्यक्रम में ही दिखती है।

लोगों की समस्या सुनने के लिए कोई चौपाल नहीं लगाई। स्थानीय नेताओं से शायद ही कोई खुश हो, लेकिन प्रधानमंत्री चुनने के लिए हर किसी को वोट नहीं दिया जा सकता। इनकी बात समझ में आई और हम शहर की ओर बढ़ चले।
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...भाषणों से सिर्फ दिल बहलता है 
हवा की सनसनाहट कान गर्म कर रही है। मगरासा गांव के सामने एक टट्टर के नीचे बैठे कुछ लोग बतिया रहे थे। धूप से निजात पाने की गरज से हम भी रुके। उनकी बातें सुनते रहे। राजा यादव ने बताया कि 24 अप्रैल को मायावती की रैली सामने वाले मैदान में ही होने वाली है। वे उत्साहित थे कि मायावती को सामने से देख पाएंगे। अखिलेश यादव के न आने से दुखी भी थे। 15 मिनट में माया, अखिलेश, राहुल और मोदी की अच्छाई और बुराई पर मंथन हो गया। हमसे भी नहीं रहा गया।
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पूछा कि चुनाव का माहौल है किसी को क्या सोचकर वोट डालते हैं। रामबाबू पासवान बोले, सरकार किसी की भी हो, स्थानीय नेता ठीक से काम नहीं करते। वे पांच साल लगातार जनता की सुध लेते रहें तो उन्हें वोट मांगने की जरूरत ही न पड़े। कोई नेता किसी के सुख दुख में साथ नहीं देता तो गांव का आदमी उसे बदलने की सोच लेता है। बड़े नेता के भाषण से दिल तो बहलता है लेकिन जरूरतें पूरी नहीं होतीं। उन्होंने बताया कि अंदर गांव (मगरासा) में दर्जनों घरों में शौचालय नहीं बने, लेकिन इसको लेकर भाषण बहुत सुने हैं। रामबाबू बात खत्म करते उससे पहले ही बीड़ी सुलगा ली। हम भी आगे को बढ़ चले। 

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...योजना के नाम पर ठगते हैं नेताओं के चमचे  
रामबाबू की बात सुन हम मगरासा की ओर चल पड़े। गांव के अंदर गहरे नाले की खुदाई चल रही है। थोड़ा आगे बढ़े तो जल निकासी के लिए गहरा नाला बनकर तैयार था। यहां चंचला देवी के घर में खुली दुकान पर रुके। पूछा- कौन बनवा रहा है नाला? जवाब आया, चुनाव बनवा रहा है। माजरा समझ गया कि चुनाव में काम दिखाने के लिए अंतिम समय पर कोई नेता मेहरबान हुआ है। बातें और बढ़ीं तो सीता ने बताया कि शौचालय की बात सिनेमा तक पहुंच गई, लेकिन मगरासा के हर घर में शौचालय नहीं बन पाया। योजना के नाम पर नेताओं के चमचे कभी सौ रुपये तो कभी 50 रुपये ठग ले गए। वोट देने की बात आई तो बोलीं, छोटों ने ठगा लेकिन बड़े नेता की क्या गलती। योजना तो सभी के लिए बनी थी। थोड़ी गांवों में निगरानी बढ़ा दें तो और अच्छा।
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गांव के युवाओं की सोचे सरकार 
झींझक में बीएससी कर रहे गांव के दीपक सिंह चंदेल ने सवाल उठाया कि किसी सरकार ने आज तक गांव के युवा के बारे में नहीं सोंचा। पढ़ लिखकर गांव का युवा गांव में ही रोजगार करे, ऐसी नीतियां नहीं बन रहीं। उद्योग और व्यापार चलाने की योजनाएं दिखावा हैं। बैंकों से लोन लेकर काम शुरू करना पहुंच वालों के लिए ही संभव है, जबकि सबसे ज्यादा युवाओं का वोट पाकर सरकारें बनती हैं। बोले, दलों का घोषणा पत्र पढ़कर वोट दूंगा। 
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