कानपुर स्थित लाजपत भवन में शनिवार को अमर उजाला ‘महारैली सुनाव’ कवि सम्मेलन में प्रसिद्ध शायर डॉ. नवाज देवबंदी व डॉ. कलीम कैशर ने देशप्रेम की गजलों से श्रोताओं को मुग्ध कर लिया। चर्चित गीतकार डॉ. विष्णु सक्सेना ने देर रात तक सजी महफिल में श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। गीतकार डॉ. अजय अटल ने अपने गीतों से समा बांध दिया।
‘अमर उजाला’ एवं तिरंगा अगरबत्ती की ओर से ‘अतुल माहेश्वरी साहित्यकार सम्मान’ के पश्चात डॉ. नवाज देवबंदी की अध्यक्षता में कवि सम्मेलन शुरू हुआ। डॉ. श्लेष गौतम ने देशप्रेम की पंक्तियां ‘वतन के वास्ते जब भी हमारा सर कलम होगा, लहू की आखिरी वो बूंद हिंदुस्तान बोलेगी’ सुनाकर सभी को देशप्रेम से ओतप्रोत कर दिया। शहर के हेमंत पांडेय ने ‘अभी करते हो हमसे बात फिर फोन बदल जाएगा... चुनाव होते ही आपका टोन बदल जाएगा’ सुनाकर चुनावी माहौल पर बात की।
संदेश तिवारी ने ‘तमन्ना है यही दिल में कलम से जीत लूं दुनिया...’ सुनाई। स्माइल मैन सर्वेश अस्थाना ने नेताओं पर चुटकी लेते हुए, ‘किसी गिरगिट की नेता से तुलना करना महापाप है। क्योंकि रंग बदलने के मामले में नेता गिरगिट का बाप है’ मुक्तक पढ़ा, तो सभी आनंदित हो उठे। हास्य कवि अखिलेश द्विवेदी ने राजनीति पर तंज कसते हुए कहा, ‘चच्चा ने राजनीति में बच्चा जिसे समझा, बच्चा वही चच्चा का भी चच्चा निकल गया’ इसे सुनकर श्रोता लोटपोट हो गए। शृंगार की युवा कवयित्री गौरी मिश्रा ने मां पर रचना सुनाई, ‘न फूलों में न कलियों में, न वो माली में आती है, जो खुशबू मां के हाथों से सजी थाली में आती है।’ उभरते गीतकार डॉ. अजय अटल ने अपना चर्चित गीत ‘नयन में सागर है वरना, अश्रु नमकीन नहीं होते। कण्ठ में करुणा है वरना, गीत गमगीन नहीं होते’ सुनाया तो श्रोता मुग्ध हो गए।
कवि मुकेश श्रीवास्तव ने ‘जागो जगकर एलान करो, ये रार न टाली जाएगी। जो आंख उठेगी भारत पर, वह आंख निकाली जाएगी’ सुनाकर देशभक्ति की बात की तो सभी ने दाद दी। अहमदाबाद के कवि हरेंद्र कुशवाहा ने ‘लोग जहां ईमान बिछाकर दरबारों में बैठे हैं, ढोंगी बनकर चोर उचक्के सरकारों में बैठे हैं’ रचना सुनाकर सरकार पर तंज कसा। प्रख्यात शायर डॉ. कलीम कैशर ने ‘मेरे मालिक, मेरे साईं बस इतनी सी तमन्ना है, मरें हिंदोस्तां में और हिंदुस्तान से उठें’ सुनाई तो श्रोता वाह-वाह कर उठे। प्रख्यात गीतकार डॉ. विष्णु सक्सेना ने ‘थाल पूजा का लेकर चले आइए, मंदिरों की बनावट सा घर है मेरा...’ और ‘रेत पर नाम लिखने से क्या फायदा...’ गीत सुनाकर पूरे भवन को मुग्ध कर दिया। ‘वंस मोर’ की आवाजें गूंजीं तो उन्हें दोबारा रचनाएं पढ़नी पड़ीं। अध्यक्षता कर रहे डॉ. नवाज देवबंदी ने ‘वह जो अनपढ़ हैं चलो हैवान हैं तो ठीक है, हम पढ़े लिक्खों को तो इंसान होना चाहिए। हिंदू-मुस्लिम चाहे जो लिक्खा हो माथे पर मगर, आपके सीने पे हिंदुस्तान होना चाहिए’ देशप्रेम की रचनाओं से सबको ओतप्रोत किया। इसके बाद राजनीति पर प्रहार करते हुए कहा, ‘तन्हाई का जश्न मनाता रहता हूं, खुद को अपने शेर सुनाता रहता हूं। वो भाषण से आग लगाते रहते हैं, मैं गजलों से आग बुझाता रहता हूं।’
‘गौरी सुनो’ : विष्णु सक्सेना ने जमकर हंसाया
शृंगार पर मुक्तक और गीत सुनाते हुए डॉ. विष्णु सक्सेना बीच-बीच में युवा कवयित्री गौरी मिश्रा को संबोधित करते हुए ‘गौरी सुनो’ बोल देते थे। इसी बीच संचालक सर्वेश अष्ठाना ने उनकी अगली रचना से पहले कहा, ‘गौरी सुनो’ तो भवन ठहाकों से गूंज उठा। डॉ. विष्णु बोले, ‘गौरी सबकी नहीं सुनती।’ थोड़ी देर बाद डॉ. विष्णु फिर बोले ‘गौरी, अब सुनो’ तो श्रोता हंसी से लोटपोट हो गए। उधर, कवयित्री गौरी मिश्रा भी मुंह छिपाकर हंसती दिख रही थीं।