एडीएम सीपी पाठक हत्याकांड: कहां से चली गोली, कैसे लगी, यह भी पता नहीं कर सकी पुलिस
Wed, 12 Dec 2018 01:23 PM IST
आशीष अग्रवाल, अमर उजाला, कानपुर
सार
- घटना के चश्मदीद एडीएम सीपी पाठक के अर्दली को कोर्ट में पेश तक नहीं किया
- विवेचकों के बयानों और पोस्टमार्टम रिपोर्ट में विरोधाभास से भी कमजोर हुआ केस
- जल्दबाजी और विवेचना की कमजोर कड़ियों का कोर्ट में आरोपियों को मिला फायदा
- सुबूत जुटाने के साथ उनकी सुरक्षा का भी रखना चाहिए ध्यान
- असावधानी में डाटा नष्ट होने से बचाव पक्ष उठा लेता है लाभ
कानपुर में एडीएम सीपी पाठक हत्याकांड में पुलिस को चार्जशीट दाखिल करने की इतनी जल्दबाजी थी कि उसने कई अहम बिंदुओं की ढंग से पड़ताल तक नहीं की। यही वजह रही कि 17 साल की लंबी न्यायिक लड़ाई के बाद भी किसी के हाथ कुछ नहीं लगा। शुरू से दबाव में रही पुलिस एडीएम पाठक के हत्यारों का पता तक नहीं लगा सकी। नतीजतन, 17 साल बाद भी यही सवाल है कि एडीएम पाठक के सीने में धंसी गोली आखिर किसने चलाई थी।
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पुलिस ने कोर्ट में घातक हथियार लेकर तैयारी के साथ बलवा करने, हत्या का प्रयास और हत्या के आरोप में चार्जशीट दाखिल की थी। मुकदमे में 18 गवाह पेश किए गए। इनमें चश्मदीदों के अतिरिक्त पुलिस और चिकित्सकों की गवाही भी अहम रही। बचाव पक्ष ने कोई भी गवाह पेश नहीं किया था। आरोपी वासिफ के अधिवक्ता शकील अहमद बुंदेला का दावा है कि प्रशासनिक अधिकारी की हत्या पर शासन और प्रशासन स्तर से पड़ रहे दबाव के चलते विवेचकों ने बिना पर्याप्त साक्ष्यों और गवाहों के जल्दबाजी में चार्जशीट कोर्ट में पेश कर दी थी।
मुकदमे के दौरान अभियोजन की कहानी में कई पेच सामने आए थे, जिन्हें बचाव पक्ष ने कोर्ट के सामने रखा था। घटना के समय मौजूद और दंगे में घायल एडीएम पाठक का अर्दली, जो घटना का चश्मदीद गवाह था, उसे कोर्ट में पेश ही नहीं किया गया। पूरे पुलिस व प्रशासनिक अमले के मौजूद रहने के बावजूद सीपी पाठक को उनके दोस्त ने अस्पताल में दाखिल कराया, किसी पुलिस वाले ने नहीं।
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शकील ने बताया कि मुकदमे में सबसे बड़ा पेच तब आया, जब मेडिकल परीक्षण और पोस्टमार्टम के दौरान पूरे शरीर की स्कैनिंग के बाद भी कोई गोली नहीं मिली, लेकिन पुलिस ने सीपी पाठक को लगी गोली उनके अंतिम संस्कार के समय अस्थियों से निकलना बताया। अभियोजन की दूसरी कड़ी तब कमजोर साबित हुई, जब एक विवेचक ने गोली को ऊपर से नीचे मारना, दूसरे ने नीचे से ऊपर मारना, जबकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गोली सामने से मारना बताया गया।
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दो आरोपियों के खिलाफ अब भी विचाराधीन है मुकदमा
एडीएम पाठक हत्याकांड में पुलिस ने छह लोगों वासिफ हैदर, मुमताज, हाजी अतीक, सफात रसूल, फाकिर और रेहान को आरोपी बनाया था। इनमें वासिफ हैदर, मुमताज, हाजी अतीक और सफात रसूल को गिरफ्तार कर पुलिस ने चार्जशीट कोर्ट में दाखिल कर दी थी। इनके मुकदमे का फैसला भी कोर्ट ने वर्ष-2004 में सुना दिया, लेकिन पुलिस दो अन्य आरोपियों फाकिर व रेहान को गिरफ्तार नहीं कर सकी थी।
घटना के लगभग नौ साल बाद पुलिस ने दोनों के खिलाफ अलग से चार्जशीट दाखिल की। अधिवक्ता शकील ने बताया कि दोनों आरोपियों के खिलाफ मुकदमा आज भी अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश की अदालत में विचाराधीन है। चार आरोपियों के मुकदमे की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में चलने के कारण फाइल वहां ट्रांसफर कर दी गई। इसके चलते इस मुकदमे में कोई कार्यवाही नहीं हो सकी। दोनों आरोपियों को हाईकोर्ट से जमानत मिल चुकी है।
राष्ट्रदोह का भी चला था मुकदमा
अधिवक्ता शकील ने बताया कि पुलिस ने वासिफ और मुमताज को हिस्ट्रीशीटर बताने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। एडीएम पाठक हत्याकांड के पहले तक दोनों के खिलाफ किसी थाने में कोई मुकदमा दर्ज नहीं था, लेकिन हत्याकांड के बाद अचानक दोनों के खिलाफ अलग-अलग थानों में 7-8 मुकदमे दर्ज कर उन्हें हिस्ट्रीशीटर और गैंगेस्टर बना दिया गया। मूलगंज के साथ स्वरूपनगर और बजरिया थाने में भी एफआईआर दर्ज कराई गई।
कई गंभीर धाराओं के साथ आयुध अधिनियम के अतिरिक्त राष्ट्रद्रोह का मुकदमा भी लिखा गया। शकील ने बताया कि पुलिस की सारी कहानी अदालत के सामने फेल साबित हुई और सभी मुकदमों में दोनों को बरी किया जा चुका है। सिर्फ गैंगेस्टर कोर्ट में ही मुकदमा विचाराधीन है।
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विवेचकों को इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों पर बल देने की जरूरत
बलवा, दंगा या भीड़ द्वारा घटित होने वाले अपराधों में विवेचक को विशेष सावधानी बरतने की जरूरत होती है। घटना के बाद भीड़ में से आरोपियों को चिह्नित करना, उनके खिलाफ पर्याप्त सुबूत जुटाना और मजबूत पैरवी कर उन्हें सजा दिलाने तक में पुलिस और अभियोजन दोनों की अहम भूमिका होती है। आजकल ऐसे मामलों में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य बहुत महत्वपूर्ण साबित होते हैं।
सहायक शासकीय अधिवक्ता राजेश्वर तिवारी ने बताया कि सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल द्वारा खींची गई फोटो या वीडियो, घटनास्थल पर मौजूद किसी फोटोग्राफर द्वारा ली गई फोटो या घटना से संबंधित कोई क्लिपिंग आदि का विशेष महत्व होता है। विवेचना के दौरान ऐसे साक्ष्यों को संकलित करने के साथ उनकी सुरक्षा भी जरूरी होती है। इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के रूप में रखी गई कोई सीडी, पेन ड्राइव, मोबाइल आदि को अच्छी तरह से सीलबंद कर विधि विज्ञान प्रयोगशाला और अदालत तक पहुंचाना महत्वपूर्ण होता है।
कई मुकदमों में लापरवाही के चलते ऐसे साक्ष्यों के टूटने से उसका सारा डाटा नष्ट हो जाता है और इन साक्ष्यों पर आधारित पुलिस की सारी विवेचना बेकार हो जाती है। बचाव पक्ष इन्हीं मसलों को अपना हथियार बनाकर बनाकर मुकदमे की पैरवी करते हैं और पर्याप्त साक्ष्य के अभाव में मुकदमे छूट जाते हैं। उन्होंने बताया कि इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के संबंध में विवेचक को इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि जिस गवाह से वह सीडी, पेन ड्राइव, मोबाइल आदि लेते हैं, उससे साक्ष्य अधिनियम की धारा 65बी के तहत एक प्रमाणपत्र भी लिखवा लेना चाहिए।
इसमें इस बात का उल्लेख हो कि जो भी साक्ष्य वह दे रहा है, उसमें कोई छेड़छाड़ या रद्दोबदल नहीं है। इससे कोर्ट में गवाह के मुकरने की संभावनाएं समाप्त हो जाती हैं और अभियोजन का पक्ष भी मजबूत बना रहता है।
विशेष लोक अभियोजक राजेश शुक्ला ने बताया कि विवेचक को सीआरपीसी की धारा-161 के तहत लिए गए गवाहों के बयानों की सीडी भी तैयार करनी चाहिए। यदि गवाहों पर संदेह हो तो गवाहों के धारा 164 के तहत कोर्ट में भी बयान दर्ज कराने चाहिए। इससे गवाहों के बयानों से मुकरने की संभावना कम हो जाती है। मोबाइल को साक्ष्य के रूप में पेश करते समय कॉल डिटेल रिपोर्ट भी कोर्ट में पेश करनी चाहिए। रिपोर्ट के आधार पर ही मोबाइल की लोकेशन पता चलती है और दोष साबित करने में मदद मिलती है।
दंगा, बलवा या भीड़ जनित अपराधों के मामलों में विवेचक की लापरवाही अक्सर मुकदमों को कमजोर कर देती हैं। भीड़ में आरोपी की शिनाख्त करना पुलिस के लिए चुनौती होती है। कई मामलों में जल्दबाजी या किसी दबाव के चलते विवेचक द्वारा खानापूरी करते हुए विवेचना पूरी कर चार्जशीट दाखिल कर दी जाती है। ऐसे मामले अदालतों में ज्यादा दिन नहीं टिक पाते और आरोपी छूट जाते हैं।
केस : 1
नानकारी और बारासिरोही गांव के रहने वालों के लोग आईआईटी गेट से आते-जाते थे। इस बात को लेकर आईआईटी के सिक्योरिटी गार्ड्स से कई बार कहासुनी होती थी। वर्ष 2004 में आईआईटी गेट से आवाजाही रोकने को लेकर दोनों गांवों के चार सौ से पांच सौ लोगों ने धावा बोल दिया था। कल्याणपुर पुलिस ने 37 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी। अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश-17 अफशां के न्यायालय में मुकदमा विचाराधीन है। एडीजीसी संजय कुमार झा ने बताया कि पुलिस की चार्जशीट में 19 गवाह थे, इनमें से पांच की गवाही हो चुकी है। कई गवाहों के पता बदल लेने के कारण इनका पता नहीं चल पा रहा है।
केस-2
अपनी शादी का कार्ड बांटने निकले विजय नगर निवासी अनिल वाल्मीकि की 12 मई 2010 को महात्मा गांधी इंटर कॉलेज के पास कुछ लोगों ने बीच सड़क पर तमंचे से गोली मारकर हत्या कर दी थी। अनिल के भाई ने अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई। बाद में पुलिस ने पांच लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी। अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश द्वितीय की अदालत में मुकदमा विचाराधीन है। विशेष अभियोजन अधिकारी राजेश शुक्ला ने बताया कि पुलिस की चार्जशीट में 27 गवाह थे। नौ को चश्मदीद बनाया गया था, लेकिन कोर्ट में सभी चश्मदीद गवाह पक्षद्रोही हो गए।