झांसी। अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद का बुंदेलखंड खास तौर से झांसी से गहरा नाता रहा। काकोरी कांड के बाद बुंदेलखंड में उन्होंने अपना अज्ञातवास बिताया। सदर बाजार स्थित बुंदेलखंड मोटर्स वर्क्स में प्राइवेट नौकरी के साथ ओरछा के जंगलों में निशानेबाजी की। अपने साथियों के साथ यहीं रहकर उन्होंने गुरिल्ला युद्ध की कला भी सीखी।
इतिहासविद् आलोक शर्मा के मुताबिक चंद्रशेखर आजाद के बुंदेलखंड से आत्मीय रिश्तों का जिक्र कई ऐतिहासिक किताबों में मिलता है। खास तौर से भगवान दास माहौर की यश की धरोहर, विश्वनाथ वैशंपायन की अमर शहीद आजाद समेत फ्रांसिसी लेखिका कैम मैकलिन की लिखी किताब ए रिव्ल्यूनशनरी हिस्ट्री ऑफ इंटरवार इंडिया शामिल हैं। इनमें आजाद के बुंदेलखंड से रिश्तों के बारे में विस्तार से लिखा है। उन्होंने बताया वर्ष 1924 से झांसी का ठिकाना बन गया था।
9 अगस्त 1925 को काकोरी कांड के बाद अशफाक, ठाकुर रोशन सिंह, राजेंद्र लाहिड़ी समेत चालीस से अधिक क्रांतिकारी गिरफ्तार हुए। सिर्फ चंद्रशेखर आजाद को ही अंग्रेज पुलिस नहीं पकड़ सकी। आजाद अंग्रेजों की पकड़ से दूर बुंदेलखंड निकल आए। कुछ माह उन्होंने शहर कोतवाली के पास रहने वाले मास्टर रुद्र नारायण के यहां बिताया। इसी दौरान उन्होंने सदर बाजार स्थित कार के गैराज बुंदेलखंड मोटर्स वर्क्स में काम किया। हालांकि काम के दौरान उनके हाथ में फैक्चर भी हो गया। उनको खाना, खासकर यहां की कढ़ी, बेहद पसंद थी।
इससे पहले करीब डेढ़ साल ओरछा में सातार नदी के किनारे स्थान को भी उन्होंने अपना ठिकाना बनाया। यहां वह हरिशंकर ब्रह्मचारी के नाम से अपनी पहचान छुपा कर रहते थे। सातार नदी के किनारे जंगल में ही उन्होंने गुरिल्ला युद्ध एवं निशानेबाजी का अभ्यास किया। कई साथियों की ट्रेनिंग भी कराई। झांसी से जाने के कुछ साल बाद ही इलाहाबाद (प्रयागराज) में वह शहीद हो गए।