बरेली समेत तराई इलाके में भगवान शिव के कई पौराणिक मंदिर हैं। कुछ मंदिरों के नाम अनूठे हैं। भगवान भोले को ये नाम उनके भक्तों ने दिए हैं। जानते हैं महादेव के रोचक नामों और उसके पीछे की मान्यताओं के बारे में...
भोले बाबा अपने नाम की तरह की बहुत भोले हैं। भांग-धतूरे के साथ ही उन्होंने भक्तों के दिए नाम को भी स्वीकार कर लिया। सागर तट पर राम ने शिवलिंग की स्थापना की तो भोले बाबा रामेश्वर हो गए। बैजू चरवाहे के नाम को भी स्वीकार कर लिया और बैजनाथ कहलाए। इनका उल्लेख आपको धर्मग्रंथों में मिल जाएगा। शिव सहस्त्रनाम से इतर भी भोले बाबा के हजारों नाम हैं जो स्थानीय मान्यताओं से जुड़े हैं। ये सभी नाम पुराणों से नहीं, बल्कि आस्था की किताब से निकले हैं। इनमें से कई सीधे तो कुछ टेढ़े भी हैं। महाशिवरात्रि के उपलक्ष्य में स्थानीय स्तर पर महादेव के रोचक नामों और उसके पीछे की मान्यताओं से आपको रूबरू करा रहे हैं।
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गोला गोकर्णनाथ मंदिर में स्थापित अद्भुत शिवलिंग
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कान के आकार का शिवलिंग, नाम गोला गोकर्णनाथ
लखीमपुर खीरी जिला मुख्यालय से 35 किमी दूर गोला गोकर्णनाथ का पौराणिक मंदिर छोटी काशी के नाम से विख्यात है। पुजारी दिनेश चंद्र मिश्र ने बताया कि पौराणिक मंदिर में कान के आकार का शिवलिंग है, इसी कारण इसका नाम गोला गोकर्णनाथ मंदिर पड़ा। यहां पौराणिक शिव मंदिर के साथ परिसर में प्राचीन बूढ़े बाबा मंदिर, खुटार मार्ग अहमदनगर पर प्राचीन बाबा क्लेश हरण, बाबा भूतनाथ मंदिर, अलीगंज स्थित प्राचीन बाबा गोकरन मंदिर, त्रिलोक गिरि मंदिर सहित कई प्राचीन शिवालय हैं। शिव के इसी महात्म्य की वजह से गोला गोकर्णनाथ को छोटी काशी भी कहा जाने लगा। मंदिर कमेटी अध्यक्ष जनार्दन गिरि ने बताया कि 15 फरवरी की शाम भगवान भोलेनाथ की बरात निकाली जाएगी और गोकर्ण तीर्थ पर भव्य दीपोत्सव होगा।
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ओयल का मेंढक मंदिर
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अनूठी वास्तुकला की मिसाल है मेंढक मंदिर
लखीमपुर खीरी के ओयल कस्बे में स्थित मेंढक मंदिर अनूठा शिव मंदिर है जो अपनी विशिष्ट वास्तुकला और मेंढक की पीठ पर बने होने के कारण प्रसिद्ध है। पुजारी शांति कुमार तिवारी ने बताया कि यह मंदिर न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि अपनी अनूठी वास्तुकला और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के कारण पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र है। यह मंदिर शहर से 12 किलोमीटर की दूरी पर है। बताया जाता है कि इसका निर्माण 1860-1870 के बीच चाहमान वंश के राजा बख्श सिंह ने करवाया था। मंडूक तंत्र पर आधारित यह मंदिर मेंढक की पीठ पर बना है और इसकी ऊंचाई लगभग 100 फुट है। लोगों का मानना है कि इसे अकाल से निपटने के लिए बनवाया गया था। यहां शिव के वाहन नंदी की खड़ी मुद्रा में मूर्ति स्थापित है।
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अमीरनगर क्षेत्र में स्थित बाबा टेढ़ेनाथ धाम
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टेढ़ेनाथ धाम शिवलिंग का आधा भाग है टेढ़ा
लखीमपुर खीरी जिला मुख्यालय से 55 किमी दूर अमीरनगर क्षेत्र में गोमती नदी के तट पर स्थित बाबा टेढ़ेनाथ धाम का इतिहास महाभारतकालीन बताया जाता है। मंदिर के पुजारी प्रेमचंद गिरि ने बताया कि इस मंदिर के शिवलिंग का आधा हिस्सा टेढ़ा है, इस कारण इसे बाबा टेढ़ेनाथ धाम कहा जाता है। मान्यता के अनुसार इस मंदिर में झूठी कसम खाना वर्जित है। ऐसा माना जाता है कि इस पौराणिक मंदिर में शिवलिंग की स्थापना महाभारत काल में युधिष्ठिर ने की थी। तब यह क्षेत्र राजा विराट के राज्य के अंतर्गत आता था। यहां उस वक्त घना जंगल हुआ करता था। महाशिवरात्रि पर यहां एक सप्ताह तक श्री महारुद्र यज्ञ का आयोजन होता है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु इसमें शामिल होते हैं। हर माह अमावस्या के मौके पर यहां मेला लगता है।
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बदायूं का बिरुआबाड़ी मंदिर
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बदायूं: बिरुआ माली के नाम पर बिरूआबाड़ी मंदिर
बदायूं शहर में स्थित शिव जी का बिरुआबाड़ी मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का विशेष केंद्र है। मंदिर के मुख्य पुजारी अभिमन्यु पांडेय ने बताया कि इस जगह पर 150 साल पहले बिरुआ नाम का एक माली खेती करता था। एक बार वह अपने खेत को जोत रहा था, तब उनका हल एक जगह अटक गया। कई बार हल अटका तो उन्होंने वहां फावड़े से खोदाई शुरू कर दी। खोदाई करते समय एक फावड़ा शिवलिंग पर लगा, जिसका निशान आज भी है। उसके बाद उन्होंने वहां पर मठिया बनाकर पूजा-अर्चना शुरू कर दी। उन्होंने बताया कि बुजुर्गों के अनुसार, वर्ष 1932 में माली बिरुआ ने इस मठिया की जिम्मेदारी लाला हरसहायमल श्यामलाल सराफ को सौंप दी। इसके बाद 1984 में मंदिर का जीर्णोद्धार शुरू कराया गया। तब से बिरुआ माली के नाम पर इसे बिरुआबाड़ी मंदिर कहा जाने लगा।
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नवाब नौबत राय शिव मंदिर
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नवाब के नाम पर है नौबत राय शिव मंदिर
बदायूं के नवाब नौबत राय ने पटियाली सराय में करीब 250 साल पहले इस शिव मंदिर का निर्माण कराया था। वर्तमान में मंदिर की देखभाल कर रहे आशीष कुमार सक्सेना बताते हैं कि बाबा नौबत राय ने यह मंदिर बनवाया था। वह ककोड़ा मेला जाते थे। वहीं उन्हें मंदिर बनवाने का विचार आया। इसके बाद उन्होंने शहर पटियाली सराय में मंदिर का निर्माण कराया। मंदिर निर्माण में प्रयोग किए गए पत्थर पारदर्शी हैं। मंदिर में स्थापित शिवलिंग पर रोशनी पड़ने पर उसका रंग मूंगिया हो जाता है।
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पीलीभीत का गौराशंकर मंदिर
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गौरीशंकर के खेत में निकला शिवलिंग, नाम पड़ा गौरीशंकर मंदिर
पीलीभीत में स्थित प्राचीन गौरीशंकर मंदिर लोक आस्था का केंद्र है। बताते हैं कि यहां घना जंगल हुआ करता था। खेतों की जोताई के दौरान भूमि के अंदर से शिवलिंग निकला था। मंदिर के नामकरण के पीछे मान्यता यह है कि जिसके खेत में यह शिवलिंग निकला, उसका नाम गौरीशंकर था। इसलिए इसका नाम गौरीशंकर मंदिर पड़ा।
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घुंघचाई क्षेत्र में स्थित इकोत्तरनाथ मंदिर
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71 शिवलिंग साथ दिखे तो नाम पड़ा इकोत्तरनाथ
पीलीभीत के घुंघचाई क्षेत्र के मंडनपुर जंगल में स्थित इकोत्तरनाथ मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। एक सदी पहले इस स्थान पर कुछ चरवाहों ने छोटे-बड़े 71 शिवलिंग देखे। इनमें एक शिवलिंग काफी बड़ा था। बाद में बड़े शिवलिंग वाले स्थान पर मंदिर का निर्माण करा दिया गया और नाम पड़ा इकोत्तरनाथ मंदिर। यह शिवलिंग दिन मे तीन बार रंग बदलता है। खास बात तो यह है कि रोजाना इस शिवलिंग पर सबसे पहले पूजा-अर्चना की हुई मिलती है। यहां पुष्प कौन चढ़ा जाता है, इसके बारे में किसी को कुछ नहीं पता है। मान्यता है कि इंद्रदेव ने श्राप से मुक्ति पाने के लिए गोमती नदी के किनारे भगवान भोलेनाथ के शिवलिंगों की स्थापना की थी।
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कलान के पटना देवकली स्थित मंदिर में स्थापित शिवलिंग
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शुक्राचार्य की तपोस्थली है पटना देवकली का शिव मंदिर
शाहजहांपुर के कलान से बदायूं मार्ग पर 12 किमी दूर स्थित ग्राम पटना देवकली का शिव मंदिर दैत्यगुरु शुक्राचार्य की तपोस्थली माना जाता है। अपनी पुस्तक ‘शाहजहांपुर : ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहर’ में इतिहासकार डॉ. एनसी मेहरोत्रा लिखते हैं कि शुक्राचार्य ने ही यहां आठ शिवलिंगों की स्थापना की। कहा जाता है कि प्रह्लाद की शिक्षा इसी स्थान पर हुई थी। यहां स्थित कुएं को ययाति कूप कहा जाता है। मंदिर के महंत अखिलेश गिरि ने बताया कि मान्यता पूरी होने पर लोग मंदिर के बाहर नल लगवाते हैं।
खंडसारीनाथ मंदिर में स्थापित शिवलिंग
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खांडसारी के कारोबारियों ने बनवाया मंदिर, नाम पड़ा खंडसारीनाथ
बरेली के आलमगिरीगंज के सराफा बाजार में यह मंदिर स्थित है। स्थानीय निवासी संजीव औतार अग्रवाल बताते हैं कि यहां पर कभी खांडसारी के कारोबारी रहते थे। उन्हीं लोगों ने सवा सौ साल पहले इस मंदिर की स्थापना करवाई थी। तब यह खंडसार वाला मंदिर कहा जाता था। धीरे-धीरे इसका नाम खंडसारीनाथ मंदिर पड़ गया। व्यापारी वर्ग नया काम शुरू करने से पहले यहां जरूर आते हैं। महाशिवरात्रि पर यहां भक्तों की भीड़ लगी रहती है।