स्वतंत्रता सेनानी ओंकारनाथ शास्त्री, पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी
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अंग्रेजों के जुल्म सहते हुए क्रांतिकारियों का साथ निभाने वाले ओंकारनाथ शास्त्री को करीब 4 वर्षों तक अपने हक की लड़ाई लड़नी पड़ी, जिसके बाद साल 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की पदवी से नवाजा। सुप्रीम आदेश के बाद सरकार को आजादी के इस रहनुमा के सामने घुटने टेकने पड़े। बेटे अनिल कुमार शास्त्री के मुताबिक दादा बृजमोहन शास्त्री का देहांत होने के बाद पिता उत्तराखंड चले गए। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी को मिलने वाली सारी सुविधाएं वहां मिलीं, लेकिन केंद्र सरकार ने सेनानी मानने से इनकार कर दिया, जिसके बाद उन्होंने वर्ष 2008 में हाईकोर्ट में केस फाइल किया, जिसमें उन्हें वर्ष 2009 में जीत मिल गई, लेकिन केंद्र ने हाईकोर्ट के फैसले को नहीं मानते हुए सुप्रीम कोर्ट से मुहर लगाकर लाने को कहा। इस पर वर्ष 2009 में ही सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाल दी। फैसला 14 सितंबर 2011 में उनके हक में आया। आखिर में केंद्र सरकार ने घुटने टेके।