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रामकथा में बोले मोरारी बापू- प्रेम तो फकीरी, फकीरी में सबसे ज्यादा नशा

Thu, 05 Mar 2020 12:54 AM IST
विनोद सिंह न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
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prayagraj news - फोटो : prayagraj
त्रिवेणी संगम के अरैल तट पर राम नाम की गूंज श्रद्धालु भक्तों को भक्ति की गंगा में गोते लगवाती रही। राम कथा मानस अक्षयवट के पांचवें दिन बुधवार को मोरारी बापू ने ‘भय प्रकट कृपाला दीनदयाला, कौशाल्या हितकारी, हर्षित महतारी मुनि मन हारी, अद्भुत रूप विचारी’ चौपाई का पाठ करते हुए प्रभु राम के जन्म का बखान किया। भक्तों ने भगवान श्रीराम का धूमधाम से जन्मोत्सव ही नहीं मनाया, बल्कि राम नाम का जप करते हुए झूमने नाचने लगे। इस दौरान प्रेम फकीरी होता है और यही सबसे बड़ा नशा है।
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संत कृपा सनातन संस्थान, नाथद्वारा के संयोजकत्व में आयोजित राम कथा के दौरान कथा वाचक मोरारी बापू ने श्रीराम जन्मोत्सव का वर्णन करते हुए आह्लादित भक्तों को की ओर से अरैल में चल रही रामकथा पांचवें दिन बुधवार को राम और कृष्ण के जीवन को मुक्ति मार्ग बताया। मोरारी बापू ने मानस की चौपाइयों की व्याख्या करते हुए इसे जीवन का सार बताया। कहा कि मानस हृदय है।
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भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं कि परमात्मा सबके हृदय में विद्यमान है। उन्होंने कहा कि हमारे जीवन में जब लोभ, अहंकार आने लगता है तो गुरु रूपी बुद्ध पुरुष हमारे दिल में ज्ञापन रूपी दिया जला देते हैं। वही राह दिखाते हैं कि चिंता मुक्त रहिए, मस्त रहिए, प्रभु की भक्ति करें। मानस विश्व का हृदय है। कोई स्वीकार करे या न करे, उसकी मर्जी लेकिन, मानस में ईश्वर बैठा है। उसकी आवाज, मानस की आवाज है, जो गुरु के चरणों में बैठकर ही सुनाई देती है।

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कथा के दौरान एक भक्त ने आम और खास का मुद्दा उठाकर खुद को उपेक्षित बताया। इस पर मोरारी बापू ने कहा कि बहस नहीं संवाद होना चाहिए। मेरा प्रयास सभी को मानस से जोड़ना और निकट लाना ही है। एक भक्त ने पास में बैठने वालों को खास बताते हुए बापू से नाराजगी जताई। इस पर बापू ने कहा कि कोई मेरा खास नहीं है और कोई मेरे आसपास भी नहीं है, लेकिन मैं सबके पास हूं। बापू ने कहा कि कि प्रेम तो फकीरी है। फकीरी सर्वोच्च नशा है। साधुता सबसे बड़ी है। कोई मजे में है तो या तो वो फकीर है या फिर नशे में है।
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मन दर्पण करें स्वच्छ, मिलेगी शांति

मोरारी बापू ने मन, मानस और मुक्ति के अर्थ का बोध कराते हुए कहा कि हमारे मन से अच्छे और बुरे सभी प्रकार के विचार खत्म हो जाएं तो मन बचता ही नहीं है। अच्छे और खराब विचारों का बंडल ही मन है। मन प्यारा है और इसी से जीवन का रस है। बताया कि श्रीकृष्ण ने भी जीवन रस में मन को स्वीकार किया है। मन को उछलकूद करने दो, जब वह थक जाएगा तो खुद ही शांत हो जाएगा। मन से तकरार न करो क्योंकि मन ही देवता, मन ही ईश्वर है। बापू ने कहा कि जिस प्रकार हम दर्पण को देखकर चेहरे का आकलन करते हैं, ठीक उसी तरह मन को निहारें, मन रूपी दर्पण को स्वच्छ करें, कल्याण होगा।

इसी क्रम में मोरारी बापू ने कहा कि जहां प्रेम है, वहां मिलन है। प्रेम का अंश ही पर्याप्त है। कथा की समाप्ति पर एडीजी प्रेम प्रकाश के साथ स्वदेशी, विदेशी भक्तों संग यजमानों ने व्यास पीठ पर बापू की आरती कर आशीर्वाद लिया। कथा पंडाल में मुख्य आयोजक मदन पालीवाल, रविंद्र जोशी, रूपेश व्यास, विष्णुकांत व्यास, मंत्रराज पालीवाल, सतुआ बाबा, फूलचंद्र दुबे के साथ बड़ी संख्या में स्वयंसेवक और राम कथा का रसपान करने आए श्रद्धालु श्रोता मौजूद रहे। 
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हम सब मनु की संतान

मानस अक्षयवट कथा के दौरान मोरारी बापू ने कहा कि कुछ लोग, कुछ लोगों को मनुवादी कहते हैं। मनु हमारे पूर्वज हैं, हम चाहे किसी भी वर्ग, धर्म से हो, सब मनु की संतान हैं। हम सब मनु से पैदा हुए हैं, इसीलिए हम मनुज कहलाएं। जैसे जल से जलज निकला वैसे ही हम मनु से मनुष्य कहलाएं। हम जिस मनु की संतान है वह स्वयं मन है। पृथ्वी के सभी जीव मनु के संतान है। कोई भले स्वीकार नहीं करें, आदि में जाओ, सत्य यही है। बापू ने कहा कि मैं मनुवादी नहीं हूं। मनु हमारा पिता है, लेकिन कोई वाद हमें पसंद नहीं। 

बखानी प्रयागराज की माहिमा

मानस कथा के दौरान मोरारी बापू ने बताया कि तुलसीदासजी ने श्रीरामचरित मानस में लिखा है कि मन तीर्थराज प्रयाग है। तुलसीदासजी मन को प्रयाग कहते हुए लिखते हैं कि वहां भी एक अक्षयवट है। जब प्रलय आने पर कुछ भी नहीं बचता है। सब तरफ  जल ही जल हो जाता है तब अक्षयवट सुरक्षित रहता है और अक्षयवट के एक पत्ते में प्रभु होते हैं। प्रलय से अक्षयवट डूब न जाए इसलिए वह बढ़ता जाता है, ऐसा पुराण में लिखा है। 
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अवतार के गिनाएं कारण

राम कथा के दौरान मोरारी बापू ने शिव पार्वती प्रसंग का उल्लेख करते हुए परमात्मा की परिभाषा बताई। उसके अनुसार जो बिना पैर चले, बिना हाथ काम करे, बिना आंख देखे और बिना वाणी के वक्ता हो, वही परमात्मा है। वही निराकार है, वह अवतार लेते हैं, वह भक्तों का प्रेम है। प्रेम के वश परमात्मा अपने नियम बदल देते हैं और मनुष्य रूप में आते हैं। बापू कहते हैं कि भगवान सबका कारण है। भगवान का कोई कारण नहीं। परमात्मा भक्त के दुख मिटाने के लिए विविध रूप लेता है। प्रभु की कृपा से ज्ञानी, मूढ़ और मूढ़ ज्ञानी बन जाता है। हमारे कर्म एकत्र होकर हमें भाग्य के रूप में मिलते हैं। इसके साथ ही बापू ने भगवान विष्णु के राम, कृष्ण, वराह, नृसिंह आदि अवतार लेने के पीछे के कारणों को प्रसंग के जरिए बताकर श्रोताओं का मार्गदर्शन किया।

प्रसाद पंडालों में पहुंचे बापू

कथा समाप्ति के बाद मोरारी बाबू अचानक प्रसाद पंडालों में पहुंच गए। भक्तों के बीच घूमे और प्रसाद ग्रहण करने को कहा। उन्होंने प्रसाद की उपलब्धता और विविधता के बारे में आयोजकों से जानकारी ली। बोले, प्रभु कथा श्रवण के बाद प्रसाद बिना भक्त लौटना नहीं चाहिए। 

कालिंदी तट पर भक्तों से की मुलाकात

अक्षयवट के ठीक सामने अरैल घाट के कालिंदी तट पर मोरारी बापू ने बुधवार शाम भक्तों से मुलाकात की, उनकी शंकाओं का समाधान किया। विशेष तौर पर बनाए गए पार्क में बापू को अपने बीच पाकर भक्तों में आशीर्वाद पाने की होड़ मची रही। करीब सवा घंटे भक्तों के बीच रहे बापू राम नाम संकीर्तन कर सबकी आस्था के केंद्र बिंदु बने रहे। 
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