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Kumbh Mela 2019: सांसारिक मोह माया छोड़, कठिन दिनचर्या से गुजर कर बनती हैं महिला संन्यासी

Tue, 22 Jan 2019 08:16 PM IST
kapil kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
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Female Naga Sadhu
कुंभ मेले में बाबाओं और संन्यासिनियों की एक अलग दुनिया संगम की रेती पर बसी हुई है। संस्कृति और संस्कार के साथ संन्यासी चोला इनके जीवन का हिस्सा है। संगम तट पर अखाड़ों में नागा संन्यासियों के शिविरों के बीच कुछ साध्वियों ने धूनी भी रमा ली है। यह साध्वियां भस्म-भभूत लगाकर दर्शन नहीं देतीं, लेकिन संन्यास परंपरा का सख्ती से निर्वाह करती हैं। भोर से ही दिनचर्या शुरू हो जाती है। स्नान के बाद धूना लगता है और फिर शुरू हो जाती है साधना। जूना अखाड़े के पास लगे माई बाड़ा में सौ से अधिक साध्वियां देश-दुनिया भर से पहुंची हैं। इन साध्वियों की दुनियां ही अलग है। वहां बिना इजाजत के कोई प्रवेश नहीं कर सकता। आपको रूबरू कराते हैं इन संन्यासिनियों की दिनचर्या से, बताते हैं कि किस तरह कठिन तप से गुजर के ये संन्यासी बनती हैं.... आगे की स्लाइड में पढ़ें...
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kumbh 2019
इंद्रियों को वश में कर लेने वाला ही संन्यासी कहलाता है। लेकिन संन्यासी बनना इतना आसान नहीं है। चाहे बाल संन्यासी हों या फिर महिला साध्वी, सभी को सांसारिक मोह माया छोड़कर कठिन तप और निर्धारित दिनचर्या का पालन करना होता है।
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kumbh
दो चरणों में बनतीं हैं महिला संन्यासी
महिला साध्वियों के लिए जूना अखाड़े में एक अलग ही बाड़ा है, जिसे माई बाड़ा के नाम से जाना जाता है। माई बाड़ा में साध्वी की पदवी पाने के लिए दो संस्कार कराए जाते हैं। पहला महापुरुष संस्कार है। जब कोई महिला संन्यासी बनना चाहती है, तो उसके गुरु सबसे पहले अपने आश्रम में उसकी योग्यता परख कर महापुरुष संस्कार कराते हैं। इस संस्कार को करने में एक से दो घंटे का समय लगता है। महापुरुष संस्कार प्राप्त संन्यासी अपने माथे पर दो बिंदियों का टीका लगाती हैं। दूसरा संस्कार विजया हवन संस्कार है। इस संस्कार को पूरा करने में लगभग 24 घंटे लग जाते हैं। यह संस्कार कुंभ के दौरान ही होता है। विजया हवन संस्कार के बाद महिला संन्यासी साध्वी संस्कारी बनती हैं।  कुछ साध्वी एक बिंदी वाला टीका लगाती हैं। स्थानधारी जमातिया साध्वी तीन बिंदी या एक बिंदी का टीका लगा सकती हैं।

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Female Naga Sadhu - फोटो : Social Media
पगड़ी पहनना जरूरी
साध्वियों के अनुसार महिलाओं की ऊर्जा उनके बालों में होती है। अपनी इस अपार ऊर्जा को केंद्रित और संग्रहीत करने के लिए महिला साध्वी अपने सर पर पगड़ी धारण करती हैं।
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female naga sadhu - फोटो : Social Media
पांच वर्ष की आयु पूरी कर ही बन सकते हैं बाल संन्यासी
संगम तीरे अखाड़ों में बाल संन्यासी देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। बाल संन्यासियों को दीक्षा देने की आयु निर्धारित है। किसी को नागापंथ की दीक्षा तब तक नहीं दी जाती जब तक वह बालक या बालिका पांच वर्ष की आयु पूरी न कर ले। इसका पालन प्रत्येक अखाड़ा करता है। कई बार अखाड़े के संत अपने आसपास के अनाथ बच्चों को गोद ले लेते हैं। पर यह जरूरी नहीं की यदि संत ने बालक या बालिका को गोद लिया है तो वह भी संत ही बने। कई बार गोद लिए बच्चों की इच्छानुसार उनका विवाह कर दिया जाता है। यदि बालक या बालिका खुद साधु बनना चाहता है तब ही उसे नागापंथ की दीक्षा दी जाती है।
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Female Naga Sadhu - फोटो : Social Media
संन्यासियों का होता है परिवार
अखाड़ा या मढ़ी साधु की पहचान होती है। साधु जिस अखाड़े या मढ़ी से जुड़े होते हैं, उसे अपना परिवार मानते हैं । इस परिवार में उनके पिता गुरु, चाचा गुरु, पिता के पिता अर्थात दादा गुरु, माता गुरु आदि होते हैं।
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Female Naga Sadhu - फोटो : Social Media
खुद चुन सकते हैं अखाड़ा
नागा संन्यासी को संन्यास ग्रहण करते समय पांच गुरुओं को अपनाना होता है। ये कंठी गुरु, भगवा गुरु, भभूति गुरु, लंगोटी गुरु व चोटी गुरु होते हैं। गुरु, अखाड़ा व मढ़ी का चयन संन्यासी स्वेच्छा से कर सकता है। पर यह तय है कि संन्यास दिलाने वाले गुरु और अखाड़ा बदलने पर भी संन्यासी संन्यास दिलाने वाले गुरु का ही चेला कहलाएगा।
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kumbh 2019
ब्रह्मलीन होने पर बांटी जाती है धूल रोट
जब किसी अखाड़े का संन्यासी ब्रह्मलीन हो जाता है तो उसके नाम पर धूल रोट बांटी जाती है। यह सभी अखाड़ों में प्रसाद के रूप में वितरित की जाती है।
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