जवाहर हत्याकांड में दोषी करार दिए गए करवरिया बंधुओं की सजा सुनाए जाने के दौरान सोमवार को कचहरी सुबह से ही छावनी में तब्दील रही। सभी गेटों पर पीएसी का पहरा रहा और वादकारियों को भी गहन चेकिंग के बाद ही भीतर जाने दिया गया। उधर, दंगा नियंत्रण उपकरणों व टियर गन लेकर जवान भी दिन भर मुस्तैद रहे। सोमवार सुबह से ही कचहरी व उसके आसपास भारी फोर्स तैनात कर दी गई थी। कर्नलगंज के साथ ही अतरसुइया, मुट्ठीगंज, जार्जटाउन, खुल्दाबाद, दारागंज समेत यमुनापार व गंगापार के भी कई थानों की फोर्स को यहां लगाया गया था। इसके अलावा पीएसी व आरआरएफ के जवानों को भी तैनात किया गया। कचहरी परिसर के सभी प्रवेश द्वारों पर पीएसी का पहरा लगाया गया था। साथ ही यहां वादकारियों को भी गहन चेकिंग के बाद ही भीतर जाने दिया गया। उधर, समर्थकों का जमावड़ा सुबह से ही होने लगा था।
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दोपहर एक बजे के बाद यह सिलसिला तेजी से बढ़ने लगा। इस दौरान समर्थकों की कचहरी परिसर के भीतर जाने को लेकर गेट पर तैनात पुलिसकर्मियों से नोकझोंक भी हुईं। हालांकि, अफसरों के सख्त रुख के चलते समर्थकों को निराश ही होना पड़ा। इसमें भाजपा के कई नेता भी शामिल रहे। समर्थकोें की भीड़ बढ़ती देख करीब एक बजे पुलिस अफसरों ने कचहरी के नए भवन के मुख्य गेट पर रस्सा बंधवाकर बैरिकेडिंग करा दी। उधर, भीतर जाने को लेकर समर्थक व पुलिसकर्मियों के बीच नोकझोंक चलती रही। जिसके बाद एसपी सिटी बृजेश कुमार श्रीवास्तव व सीओ बैरहना रत्नेश सिंह ने खुद गेट पर पहुंचकर मोर्चा संभाला और फिर समर्थकों को गेट से दूर किया। वहीं, किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए जवान बॉडी प्रोटेक्टर, हेलमेट लेकर मुस्तैद रहे। साथ ही टियर गन लेकर भी पुलिसकर्मी घूमते रहे।
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दो सेक्टर में बांटकर किए गए थे सुरक्षा इंतजाम
पुलिस अफसरों ने बताया कि कचहरी व उसके आसपास के इलाके को दो सेक्टरों में बांटकर सुरक्षा व्यवस्था की गई थी। इनमें से एक आउटर तो दूसरा इनर सेक्टर था। आउटर सेक्टर में जहां खुल्दाबाद, लालापुर, शिवकुटी, दारागंज, अतरसुइया उतरांव आदि थाने की फोर्स लगाई गई थी। वहीं, इनर सेक्टर में होलागढ़, थरवई, कर्नलगंज, जार्जटाउन, कोतवाली, शाहगंज आदि थाने की फोर्स तैनात रही। उधर, सीओ बैरहना जहां कचहरी गेट पर रहकर सुरक्षा व्यवस्था के लिए आउटर सेक्टर में तैनात फोर्स का नेतृत्व करते रहे वहीं, सीओ कर्नलगंज सत्येंद्र प्रसाद तिवारी एडीजे 5 कोर्ट के आसपास तैनात रहे और इनर सेक्टर की सुरक्षा की कमान संभाले रहे।
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कचहरी रोड पर नहीं आने दिए गए बड़े वाहन
उधर सुबह से ही कचहरी रोड पर ट्रैफिक डायवर्जन व्यवस्था लागू कर दी गई थी। इसके लिए जगह-जगह बैरिकेडिंग कर बड़े वाहनों का प्रवेश रोक दिया गया था। आनंद अस्पताल, पुलिस क्लब, लक्ष्मी टॉकीज, जगराम चौराहा आदि स्थानों पर बैरिकेडिंग की गई थी। जहां से सिर्फ दोपहिया वाहन सवारों को ही कचहरी की ओर जाने दिया गया। इसके साथ ही डीएम कार्यालय समेत कचहरी रोड पर जगह-जगह फोर्स तैनात की गई थी। आनंद अस्पताल से चारपहिया वाहनों को स्टैनली रोड मम्फोर्डगंज होते हुए लक्ष्मी चौराहे की ओर भेजा गया। उधर अन्य जगहों पर भी ट्रैफिक को वैकल्पिक रास्तों से होकर गुजारा गया।
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मंत्री पर हमले का आरोपी भी दिखा कोर्ट परिसर में
एक खास बात यह रही कि सजा के एलान के दौरान मंत्री नंद गोपाल गुप्त पर हमले का आरोपी दिलीप मिश्र भी कचहरी परिसर में घूमता मिला। पहले वह व उसके समर्थक कटरा चौकी के सामने स्थित कचहरी नए भवन के मुख्य गेट के पास जमा रहे। हालांकि, जैसे ही करवरिया बंधुओं को नैनी जेल से कोर्ट के भीतर लाया गया, वह अपने साथियों संग कचहरी परिसर के भीतर पहुंच गया। कोर्ट में उसकी मौजूदगी चर्चा का विषय बनी रही।
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भावुक समर्थक को देखकर रुके उदयभान, बोले- हम फिर आएंगे
प्रयागराज। नैनी जेल से लाने के बाद कचहरी में प्रवेश करते वक्त उदयभान करवरिया को देखते ही उनकी एक महिला समर्थक बिलखने लगी। जिसे देखकर वह रुके और उसे ढ़ांढस बंधाते हुए कहा कि चिंता मत करो। हम फिर लौटकर आएंगे। इतना कहकर वह कचहरी के भीतर चले गए। नैनी जेल से करवरिया बंधुओं को दोपहर एक बजे के करीब जिला कचहरी लाया जाना था। हालांकि, वह करीब डेढ़ घंटे की देरी से 2.45 मिनट के आसपास वहां पहुंचे। कटरा पुलिस चौकी के सामने स्थित कचहरी नए भवन के मुख्य गेट पर जैसे ही प्रिजन वैन के पीछे चल रही एंबुलेंस रुकी, वहां मौजूद समर्थकों ने उसे घेर लिया। साथ ही समर्थन में नारेबाजी भी की। कुछ देर बाद एंबुलेंस से सबसे पहले उदयभान करवरिया उतरे। वह एंबुलेंस से उतरकर कचहरी गेट की ओर बढ़े ही थे कि उनकी नजर बाईं ओर खड़ी महिला समर्थक पर पड़ी। जो उन्हें देखते ही बिलखने लगी। इस पर उदयभान ठहर गए। और समर्थक को ढांढस बंधाते हुए कहा कि ‘परेशान मत होईए। हम फिर लौटकर आएंगे।’ इतना कहकर वह कचहरी के भीतर चले गए। हालांकि महिला समर्थक इसके बाद भी अपने आंसू संभाल नहीं सकी और वह कुछ देर तक बिलखती ही रही। पूछने पर उसने अपना नाम रीता सिंह पत्नी अशोक सिंह निवासी उरुवा मेजा बताया। साथ ही कहा कि वह मेजा विधानसभा क्षेत्र की कार्यकर्ता है।
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बिलखती रहीं कल्लू के परिवार की महिलाएं
उधर, मामले के चौथे आरोपी रामचंद्र उर्फ कल्लू की परिवार की महिलाएं भी कचहरी पहुंचीं। नैनी जेल से चारोें आरोपियों को लाए जाने के दौरान वह भी गेट पर पहुंचीं थीं। हालांकि भीड़ ज्यादा होने के कारण वह कल्लू को देख भी नहीं सकीं। इसे बाद उन्होंने कचहरी के भीतर जाने की कोशिश की। लेकिन, पुलिस ने भीड़ ज्यादा होने के कारण उन्हें कचहरी परिसर में प्रवेश न करने की सलाह दी। जिसके बाद वह गेट के पास ही खड़े होकर रामचंद्र के आने का इंतजार करने लगीं। इस दौरान उनकी आंखों से आंसू बहते रहे।
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फैसले के खिलाफ अब अपील का विकल्प
प्रयागराज। उम्रकैद की सजा सुनाए जाने के फैसले के बाद अब अभियुक्तों के पास हाईकोर्ट में अपील का विकल्प ही रह गया है। सेशनकोर्ट के फैसले के खिलाफ नियमानुसार हाईकोर्ट में अपील दाखिल की जाती है। सेशन कोर्ट केफैसले के खिलाफ सीआरपीसी की धारा 374(2) में हाईकोर्ट में अपील दाखिल की जाती है। अपील पर सुनवाई लंबित रहने के दौरान अभियुक्त पक्ष सेशनकोर्ट का फैसला निलंबित करने या जमानत पर रिहा करने की मांग कर सकता है। सजा के बिंदु पर सुनवाई होने के बाद फैसले का इंतजार कर रहे उदयभान करवरिया कुछ देर के लिए अदालत कक्ष से बाहर आए और समर्थकों को ढांढस बंधाया। इस दौरान वह मुस्कराते रहे मगर बीच बीच में गंभीर हो जाते। चिंता की लकीरें माथे पर उभर आती थीं। इस बीच एक समर्थक ने पानी बोतल पकड़ाई तो उन्होंने लपक कर ले लिया और पानी पीने के बाद कुछ राहत महसूस करते हुए फिर समर्थकों से बातचीत में मशगूल हो गए।
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नीलम को मलाल, भाजपा नेताओं ने करवरिया परिवार से बनाए रखी दूरी
मेजा से भाजपा विधायक एवं पूर्व विधायक उदयभान करवरिया की पत्नी नीलम करवरिया को इस बात का मलाल है कि पार्टी के तमाम नेताओं ने उनके परिवार से दूरी बना रखी है। सोमवार को जिला कचहरी हो या फिर कल्याणी देवी स्थित करवरिया बंधु का आवास। इन दोनों ही स्थानों पर करवरिया बंधु के सैकड़ों समर्थक तो मौजूद रहे लेकिन भाजपा के पदाधिकारी एवं वरिष्ठ नेता नदारद रहे। खुद नीलम करवरिया ने कहा कि पार्टी का विधायक होने के बावजूद भी भाजपा नेता एवं वरिष्ठ पदाधिकारियों ने करवरिया परिवार से अपनी दूरी बना कर रखी। इस बात मुझे कष्ट है। इस बीच विधायक नीलम करवरिया दिन भर अपने आवास पर ही मौजूद रही। उनसे मिलने के लिए प्रयागराज ही नहीं, कौशांबी, फतेहपुर, बांदा, चित्रकूट आदि जिलों से ढेरों समर्थक सुबह से ही पहुंचने शुरू हो गए। इस बीच उन्होंने अधिकांश समर्थकों से मुलाकात भी की। कचहरी में क्या चल रहा है इसकी पल-पल की खबर करवरिया बंधु के समर्थक उनतक पहुंचाते रहे। करवरिया बंधु को उम्र कैद की सजा मिलने के बाद नीलम ने दोहराया कि वह इस निर्णय के खिलाफ हाईकोर्ट जाएंगी। कहा कि न्याय के लिए जहां तक जाना होगा वहां जाऊंगी। बातों ही बातों में उन्होंने कहा कि इस बात का मुझे भी कष्ट है कि पार्टी के वरिष्ठ पदाधिकारियों ने करवरिया परिवार से दूरी बना रखी है। हालांकि भाजपा के ही कुछ नेता ऐसे रहे जो लगातार विधायक नीलम करवरिया के संपर्क में भी रहे।
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समर्थकों ने कहा मिल गया पार्टी से वफादारी का इनाम
प्रयागराज। सोमवार को करवरिया बंधु को कोर्ट द्वारा सजा मिलने के पूर्व ही सोशल मीडिया में उनके समर्थकों ने ‘दुआ में याद रखना’ मुहिम शुरू कर दी। हालांकि सजा घोषित होने के बाद तमाम समर्थकों के सुर ही बदल गए। किसी ने लिखा कि ‘शेर जल्द वापस लौटेगा’ तो किसी ने पोस्ट किया ‘हर कदम आपके साथ’। इस बीच कुछ समर्थक ऐसे भी रहे जिनकी पोस्ट भाजपा पार्टी लाइन के खिलाफ रही। अतुुल द्विवेदी नाम के समर्थक ने पोस्ट कर दिया कि ‘बीजेपी से वफादारी का मिला इनाम’। यह पोस्ट खूब शेयर भी हुई। करवरिया बंधु के समर्थक शत्रुध्न मिश्र ने पोस्ट किया ‘शेर जल्द लौटेगा, फिर षडयंत्र कारियों से बदला लेगा’। शुभम करवरिया ने पोस्ट किया ‘जिसने तमाम नेता बनाए हो, उन्हें नेताओं के साथ की जरूरत नहीं, आपार जनसमूह का प्यार ही ताकत है। पूर्व विधायक उदयभान के समर्थक सोशल मीडिया में कुछ ज्यादा ही मुखर रहे। आलोक तिवारी ने पोस्ट किया ‘नजर सभी साथियों पर मेरी आज भी वैसी है, कुछ बंदिशें हैं जो आपसे मिलने नहीं देती’। इसी तरह सुधांशु दुबे, मंजीत तिवारी, आनंद पांडेय आदि की पोस्ट भी खूब वायरल हुई।
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अदालत में औंधे मुंह गिरीं बचाव पक्ष की दलीलें
प्रयागराज। जवाहर हत्याकांड में बचाव पक्ष की दलीलें और 156 गवाहों की लंबी फेहरिस्त काम नहीं आई। अदालत ने अभियोजन के साक्ष्यों को अधिक विश्वसनीय मानते हुए अभियुक्तों को सजा सुनाई। पूर्व मंत्री कलराज मिश्र और मुरली मनोहर जोशी के करवरिया बंधुओं के पक्ष में दिए गए बयान भी बचाव पक्ष के काम न आए। बचाव पक्ष की एक अहम दलील घटना में प्रयोग की गई मारुति वैन को लेकर थी। कहा गया कि जिस वैन से हमलावरों का आना बताया जा रहा है, उस वैन संख्या यूपी 70-8070 का घटना में प्रयोग नहीं किया गया। मारुति वैन उस समय इसके मालिक सुरेंद्र सिंह के पिता के अंतिम संस्कार में शामिल लोगों द्वारा ले जाई गई थी। कोर्ट ने विचारण में पाया कि मारुति वैन की बरामदगी को लेकर गवाह छेदी सिंह और अन्य गवाहों के बयान में विरोधाभास है। सभी अलग-अलग समय बता रहे हैं। गवाहों का कहना था कि घटना के समय वैन रसूलाबाद घाट गई थी। मगर इसका कोई निश्चय साक्ष्य नहीं दिया गया है। जबकि घटना के कुछ ही देर बाद दर्ज कराई गई एफआईआर में मारुति वैन का नंबर दर्ज किया गया है। कोर्ट ने माना कि अभियोजन मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्य से घटना को संदेह से परे साबित करने में सफल रहा है। बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि घटना वाली रात 12 बजकर 10 मिनट पर एसएसपी ने लखनऊ एक फैक्स किया था, जिसमें अज्ञात गाड़ी और अज्ञात हमलावरों का जिक्र किया गया। कोर्ट ने यह दलील भी नकार दी।
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बचाव पक्ष ने आधार लिया था कि घटना के समय इंस्पेक्टर सिविल लाइंस और पहले विवेचक राधामोहन दुबे ने बयान दिया है कि वह घटना के बाद जब मौके पर पहुंचे तो वहां जवाहर के परिवार का कोई सदस्य उनको नहीं दिखा। कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए विवेचक राधामोहन की भूमिका पर ही सवाल खड़े किए हैं। बचाव पक्ष की यह दलील भी काम नहीं आई, जिसमें कहा गया कि वादी सुलाखी यादव ने प्रेम सिंह से टेलीफोन पर बातचीत में कहा कि कपिल मुनि को मैने झूठा फंसाया है। कोर्ट में टेलीफोन सेट और कॉल डिटेल पेश की गई। वादी सुलाखी ने बातचीत की बात स्वीकार की मगर, उसने यह नहीं माना कि उसने झूठा फंसाए जाने की कोई बात की थी। बचाव पक्ष का कहना था कि जवाहर पंडित के सभी रिश्तेदारों के पास लाइसेंसी असलहे हैं और वह सुरक्षा के लिए जवाहर के साथ होने की बात कह रहे हैं मगर, घटना के वक्त किसी के पास कोई असलहा नहीं था। सभी के असलहे घर पर थे। इसका अर्थ है कि कोई मौके पर मौजूद नहीं था। मगर इस तर्क को अदालत ने नहीं माना।
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चेहरे पर थी मुस्कान पर आंखें बयां कर रहीं थीं दर्द
जवाहर हत्याकांड में उम्रकैद की सजा सुनाए जाने के दौरान कपिल मुनि करवरिया, उदयभान करवरिया और सूरजभान करवरिया पूरी तरह से सामान्य दिख रहे थे। उनके चेहरों पर मुस्कान थी मगर आंखों से आत्मविश्वास की वह चमक गायब थी, जो इससे पहले नजर आती थी। करवरिया बंधु जितनी देर भी अदालत परिसर में रहे, समर्थकों से मुस्कराकर और हंसकर बात करते रहे मगर चंद क्षणों की चुप्पी होते ही चिंता की गहरी लकीरें उनके चेहरे पर उभर आती थीं। पूरे समय यही क्रम चलता रहा। यूं तो तीनों भाई समर्थकों को ढांढस देते रहे थे मगर, उनको भी शायद यह पता था कि उनके साथ क्या हो चुका है। सजा तो 31 अक्तूबर को दोषसिद्ध साबित होते ही तय हो चुकी थी। कितनी सजा मिलनी है यह जानना बाकी थी। यह भी एक बजह थी कि उन्होंने खुद को संभाले रखा था क्योंकि उनको भी पता था कि जो होना था हो चुका है।
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खचाखच भरा रहा कोर्ट रूम
सजा सुनाए जाने की कार्यवाही देखने के लिए अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश (स्पेशल जज गैंगस्टर) कक्ष संख्या पांच में दिन में एक बजे से ही वकील और समर्थक पहुंचने लगे। हालांकि कोर्ट रूम के बाहर तैनात सुरक्षाकर्मियों को वकीलों को छोड़कर और किसी को भीतर नहीं जाने दिया। वकील ही इतनी बड़ी संख्या में थे कि पूरे कोर्ट रूम में तिल रखने भर की जगह नहीं थी। दिन में करीब तीन बजे जब करवरिया बंधुओं को जेल से लाया गया तो उनको कोर्ट रूम के भीतर ले जाने में सुरक्षाकर्मियों को खासी मशक्कत करनी पड़ी। चारों अभियुक्तों को कटघरे के बजाए सीधे डायस के पास ले जाया गया। चूंकि फैसले पर अभियुक्तों के हस्ताक्षर भी लेने थे इसलिए भीड़ को देखते हुए कटघरे में खड़ा करने का निर्णय बदलना पड़ा।
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कब क्या हुआ
1- 13 अगस्त 1996- जवाहर पंडित सहित तीन की हत्या
2- 14 अगस्त 1996- मृतकों का पोस्टमार्टम किया गया
3- 20 अगस्त 1996- भाजपा सांसद मुरली मनोहर जोशी ने विवेचना बदलने के लिए पत्र लिखा
4- 28- अगस्त 1996- विवेचना सीबीसीआईडी इलाहाबाद शाखा को स्नांतरित
5- 12 फरवरी 1999- विवेचना सीबीसीआईडी वाराणसी को स्थानांतरित
6-सात मई 2002 - विवेचना सीबीसीआईडी लखनऊ शाखा को स्थानांतरित
7- 25 नवंबर 2003- सीबीसीआईडी लखनऊ ने पहली प्रोग्रेस रिपोर्ट दाखिल की
8- 20 जनवरी 2014- सीबीसीआईडी ने चार्जशीट दाखिल की
9- 16 अगस्त 2005- हाईकोर्ट ने कपिलमुनि, सूरजभान और रामचंद्र त्रिपाठी के खिलाफ मुकदमे पर रोक लगाई
10- एक जनवरी 2015- उदयभान करवरिया ने सरेंडर किया, जेल गए
11- आठ अप्रैल 2015 को हाईकोर्ट का स्थगन आदेश समाप्त
12- 28 अप्रैल 2015 को कपिलमुनि, सूरजभान, रामचंद्र ने सरेंडर किया, जेल भेजे गए
13- 19 अक्तूबर 2015 से गवाही शुरू
14- 18 अगस्त 2019 सुनवाई पूरी, फैसला सुरक्षित
15- 31 अक्तूबर 2019- चारों आरोपी हत्याकांड में दोषी करार
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आजीवन कारावास मतलब अंतिम सांस तक की कैद
जिले के अबतक के सबसे चर्चित हत्याकांड जवाहर पंडित हत्याकांड में अदालत करवरिया बंधुओं का उम्रकैद की सजा सजा सुना चुकी है। सामान्य तौर पर उम्रकैद या आजीवन कारावास की सजा को लेकर आम लोगों में कई प्रकार के भ्रम हैं। सामान्यत: लोग इसे 14 या 20 साल की कैद की सजा मानते हैं। आम धारणा है कि उम्रकैद का मतलब अंतिम सांस तक की सजा नहीं होता है। कई बार ऐसा भी सुनने में आता है कि उम्रकैद की सजा पाया बंदी 14 या 20 साल के बाद रिहा कर दिया गया।
क्या है संवैधानिक व्यवस्था
संविधान में उम्रकैद को लेकर कहीं नहीं लिखा गया है कि यह 14 या 20 वर्ष की अवधि की सजा होगी। अदालतें सजा का आदेश देते समय सिर्फ उम्रकैद या आजीवन कारावास का उल्लेख करती हैं। उसमें कोई वर्ष अंकित नहीं होता। संगीत व अन्य बनाम स्टेट ऑफ हरियाणा में वर्ष 2012 में सुप्रीमकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि उम्रकैद का मतलब पूरे जीवन की जेल इससे अधिक कुछ नहीं। आजीवन कारावास का मतलब पूरे जीवन के लिए जेल।
राज्य सरकार को है सजा कम करने का अधिकार
दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 432 में राज्य सरकार को अभियुक्त को दी गई सजा कम करने का अधिकार दिया गया है। इसके लिए पूरी प्रक्रिया निर्धारित की गई है जिसका पालन करके सरकार सजा को घटाने के लिए सजा सुनाने वाली अदालत से अनुमति मांग सकती है। 433 ए सीआरपीसी के अनुसार उम्रकैद की सजा पाए अभियुक्त को कम से कम 14 वर्ष की सजा काटनी होगी। इसका अर्थ है कि उम्रकैद की सजा पाए व्यक्ति की सजा यदि सरकार कम करना चाहती है तब भी उसे कम से कम 14 वर्ष जेल में काटने ही होंगे।
रिहाई से पूर्व देखना होगा आचरण
कानूनी प्रावधानों के अनुसार 14 वर्ष की सजा के बाद यदि सरकार किसी बंदी को छोड़ने का निर्णय लेती तो उसे कैदी के व्यवहार, बीमारी, पारिवारिक परिस्थिति आदि बिंदुओं को ध्यान में रखकर निर्णय लेना होगा।
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वादी के वकील ने मांगी करवरिया बंधुओं के लिए फांसी
वादी मुकदमा विजमा यादव के वकील ने सजा पर फैसला सुनाए जाने से पूर्व सजा के बिंदु पर बहस केदौरान करवरिया बंधुओं को फांसी की सजा देने की मांग की। अधिवक्ता लल्लन यादव ने दलील दी कि यह एक विरल से विरलतम मामला है। इस घटना में एके 47 जैसे स्वचलित असलहे का प्रयोग हुआ। भरे बाजार में घटना को अंजाम दिया गया जिसमें तीन लोग मारे गए। मरने वालों में एक राहगीर भी शामिल है। घटना से पूरे क्षेत्र में दहशत फैल गई थी। लोग भयभीत हुए और बाजार बंद हो गए थे। बचाव पक्ष ने इस बात का विरोध किया यह विरल से विरलतम मामला नहीं है। अभियुक्तगणों का यह पहला अपराध है। बचाव पक्ष ने कहा कि अभियुक्तों का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है। किसके हाथ में कौन सा असलहा था इसका जिक्र प्राथमिकी में नहीं है। यह बात अदालत मेें 20 साल बाद पहली बार बताई गई। इसलिए उदारता बरतते हुए कम से कम सजा दी जाए। हालांकि करवरिया बंधुओं ने अपनी ओर से सजा के प्रश्न पर कुछ नहीं कहा।
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दोआबा की गलियों से निकलकर सियासतदां बने करवरिया बंधु
बहुचर्चित जवाहर पंडित हत्याकांड में उम्रकैद की सजा पाने वाले करवरिया बंधु दोआबा कीगलियों से निकलकर ही सियासतदां बने। इनके बाबा, पिता और ताऊ ने भी कौशाम्बी से लेकर प्रयागराज तक की सियासत में हाथ आजमाए, लेकिन निराशा हाथ लगी। करवरिया बंधुओं ने पिता-ताऊ द्वारा तैयार की गई सियासी जमीन पर कामयाबी की इमारत खड़ी कर दी। पिता मौला भुक्खल और चाचा की आपराधिक शोहरत का तीनों भाइयों ने बखूबी इस्तेमाल किया।
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करवरिया बंधुओं का इतिहास खंगालें तो इनके बाबा जगतनारायण करवरिया ने समाज में प्रतिष्ठा हासिल करने के लिए 1962 में पहली बार सिराथू विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा। हालांकि जीत नहीं पाए। बाद में उनकी निर्मम तरीके से हत्या कर दी गई। हत्याकांड को उनके बड़े बेटे श्याम नारायण करवरिया उर्फ मौला महाराज ने अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ लिया। मौला महाराज ने सियासी कदम बढ़ाते हुए मंझनपुर विकास खंड से ब्लॉक प्रमुखी का चुुनाव लड़ा। लेकिन, निकटतम प्रतिद्वंद्वी उधोश्याम केसरवानी से हार गए। आगे भी उन्होंने कई चुनावों में किस्मत आजमाई, पर हताशा ही हाथ लगी। उधर, छोटे भाई भुक्खल महाराज ने अपना सियासी कदम प्रयागराज में जमाना शुरू किया। इसके साथ ही आपराधिक दुनिया में भी उनका परचम लहराने लगा।
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कौशांबी से लेकर इलाहाबाद तक उनकी हनक थी। इसी दौरान वह शहर दक्षिणी से विस चुनाव लड़े लेकिन मायूसी हाथ लगी। इस सबके बीच भुक्खल महाराज के तीन बेटे कपिलमुनि करवरिया, उदयभान करवरिया और सूरजभान करवरिया राजनीति का ककहरा समझने लगे थे। सबसे पहले मझले भाई उदयभान ने डिस्ट्रिक कोऑपरेटिव बैंक के चुनाव में हाथ डाला। जिले के कद्दावर नेता व पूर्व डिस्ट्रिक कोऑपरेटिव बैंक के अध्यक्ष शिवसागर सिंह को पराजित करके जनप्रतिनिधि के रुप में परिवार के पहले सदस्य बने। इस कामयाबी के बाद करवरिया बंधुओं ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। बड़े भाई कपिलमुनि करवरिया ने वर्ष 2000 में जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी हासिल की।
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जनप्रतिनिधि के रूप में दोआबा से लेकर प्रयागराज तक उनकी शोहरत में इजाफा होता गया। मझले भाई उदयभान करवरिया ने इसी का फायदा उठाते हुए भारतीय जनता पार्टी से टिकट लेकर वर्ष 2002 में बारा विधानसभा सीट से चुनाव लड़कर जीत हासिल की। इसी बीच तीसरे भाई सूरजभान करवरिया ने समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता हरिमोहन यादव को हराकर वर्ष 2005 में मंझनपुर ब्लॉक प्रमुख (सदर ) सीट पर कब्जा कर लिया। उसी दौरान विधान परिषद का चुनाव हुआ। जिसमें सूरजभान करवरिया ने बसपा का दामन थामकर कामयाबी का झंडा बुलंद किया। उधर, बसपा में इंट्री लेकर बड़े भाई कपिलमुनि करवरिया ने फूलपुर संसदीय सीट से वर्ष 2009 में सांसदी का चुनाव लड़ा और फतह हासिल की। उदयभान की पत्नी नीलम करवरिया मौजूदा समय मेजा से विधायक हैं।
मुश्किल के समय में खिलाया था कमल
मंझनपुर। वर्ष 2000 में कौशाम्बी जिपं अध्यक्ष पद का चुनाव सपा और बसपा संयुक्त रूप से लड़ रही थी। तब विपक्षियों के पास जिपं सदस्यों की संख्या काफी ज्यादा थी। भाजपा के पास सिर्फ पांच सदस्य थे। ऐसे में भाजपा उम्मीदवार कपिलमुनि करविया का चुनाव जीतना टेंढ़ी खीर थी। हालांकि तमाम संघर्षों के बाद भी कपिल ने भाजपा का झंडा बुलंद किया। इस चुनाव में सदस्यों को तोड़े जाने पर कई दफा हंगामा तक हुआ था।
सदर प्रमुख की सीट पर जमाए रखा कब्जा
मंझनपुर। वर्ष 2005 में सदर ब्लॉक प्रमुख की कुर्सी हथियाने के बाद विधान परिषद का चुनाव हुआ। जिसमें प्रमुख सूरजभान करवरिया ने जीत हासिल की। एमएलसी बनने के बाद करवरिया परिवार ने कुर्सी पर कब्जा नहीं छोड़ा। सूरजभान ने चचेरे भाई शेष नारायण उर्फ कल्लू करवरिया को प्रमुख बनाया। बाद में वर्ष 2016 में सपा नेता हरिमोहन यादव कल्लू को हराकर प्रमुख बने।
सोशल साइट पर गुस्से का गुबार
मंझनपुर। करवरिया बंधुओं को उम्रकैद की सजा होते ही समर्थक मायूस हो गए। तमाम समर्थक जो प्रयागराज गए थे। वे, उदासी के बीच लौट आए। समर्थकों ने सोशल साइटों पर जमकर गुस्से का इजहार किया। किसी ने इसके लिए सरकार को दोषी ठहराया तो किसी ने सजा को सियासी दबाव का परिणाम बताया।
गांव में सजा का मिला-जुला असर
मंझनपुर। करवरिया बंधुओं के गांव में उम्रकैद की सजा का मिला-जुला असर देखने को मिला। समर्थकों का तबका और परिवार के सदस्य जहां आंसू बहा रहे थे। वहीं, विरोधी खेमा इसे आजाद दिवस बता रहा था। हालांकि किसी ने खुलकर विरोध नहीं किया। एहतियात के तौर पर नगर कोतवाल खुद फोर्स के साथ गांव में डटे रहे।