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अखाड़ों की दुनिया में एक ‘हाईकोर्ट’ भी है, उदासीन के संतों ने 93 वर्ष पहले किया था गठन

Sat, 12 Jan 2019 02:34 PM IST
देव कश्यप अनिल सिद्धार्थ, अमर उजाला, प्रयागराज
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peshwai Udasin
अखाड़ों की निराली दुनिया में एक ‘हाईकोर्ट’ भी है। इसका गठन पंचायती अखाड़ा बड़ा उदासीन के संतों ने 93 वर्ष पहले तब किया था, जब वे लाहौर हाईकोर्ट से चिलम पीने के खिलाफ दायर केस जीते थे। इस बात से संत इतना खुश हुए कि उन्होंने अपने समूह का नाम ही ‘हाईकोर्ट’ रख दिया। तब से बड़ा उदासीन अखाड़े में यह ‘हाईकोर्ट’ अनवरत जारी है। हालांकि इस ‘हाईकोर्ट’ में मुकदमे नहीं सुने जाते बल्कि तरह-तरह के व्यंजनों की अपील की जाती है। मूल अखाड़े की तरह ही ‘हाईकोर्ट’ के महंत के अतिरिक्त इसकी व्यवस्था संभालने में भंडारी, कोठारी, कारबारी और कोतवाल भी शामिल हैं।
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peshwai Udasin
दरअसल फक्कड़, अलमस्त साधुओं की जमात जुटी तो उनकी रसोई का स्वाद और स्वरूप भी उन्हीं की रुचियों के अनुरूप हो गया। ‘हाईकोर्ट’ के संतों के साथ ही यहां जुटने वाले भक्तों की रुचि का भी ख्याल रखा जाता है। इसीलिए यहां व्यंजनों की विविधता दिखती है। निर्वाण साधुओं के साथ ही हाईकोर्ट में आने वाले श्रद्धालुओं को भी सुबह, शाम की ‘नई डिश’ की प्रतीक्षा रहती है। ‘हाईकोर्ट’ के चौथे और मौजूदा महंत लक्ष्मण दास कहते हैं, अखाड़े के भ्रमणशील पंचों और निर्वाण साधुओं की ओर से अपनी श्रद्धा और सुविधा के अनुसार सहयोग किया जाता है, जो उन्हें देश भर में घूमने के दौरान भक्तों से मिलता है।
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पेशवाई - फोटो : अमर उजाला, प्रयागराज
अखाड़े के ‘हाईकोर्ट’ के कोतवाल गिरधर दास कहते हैं, यहां का नाश्ता और खाना सात्विक तो है, लेकिन विविधता दिखती है। अखाड़े के ज्यादातर श्रद्धालु पंजाब और राजस्थान से भी जुड़े हैं, सो बाटी-चूरमा, मक्के की रोटी-सरसों का साग, छोले कुलचे, दाल-बाटी सहित तरह-तरह के व्यंजन बनते हैं। इसके अतिरिक्त राजमा, कढ़ी, पकौड़ी, टिक्की, समोसा, रसगुल्ला के अतिरिक्त ‘कड़ा प्रसाद’ में हलुआ भी बनता है। कभी-कभी तो कई तरह की डिशेज एक साथ बन जाती हैं। व्यंजन स्वादिष्ट हो, इसीलिए व्यंजनों में घी और मेवे डालने में कोताही नहीं होती। इसमें अखाड़े से जुड़े श्रद्धालु भी सहभागी है, इसीलिए कभी-कभी तो चिप्स और कुरकुरे भी बांटे जाते हैं।
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Peshwai Atal Akhara
तकरीबन 93 बरस पहले हुई थी 'हाईकोर्ट' की स्थापना
बड़ा उदासीन अखाड़े के ‘हाईकोर्ट’ की स्थापना तकरीबन 93 वर्ष पहले हुई थी। कोठारी राघवेंद्र दास कहते हैं, वर्चस्व के विवाद के तहत वर्ष 1926 में लाहौर हाईकोर्ट से ‘चिलम’ की लड़ाई जीतने की खुशी में ही उदासीन संप्रदाय के संतों के एक वर्ग ने अखाड़े के भीतर इस ‘हाईकोर्ट’ का गठन किया था। श्रीमहंत सोहनदास अलबेला इसके पहले मुखिया बने थे, फिर मंगलदास, पूरनदास ने इसकी जिम्मेदारी संभाली।
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