यूरोपीय महाद्वीप के छोटे से देश माल्टा में जन्में भारतीय मूल के हेंड्रिक कालका अपने लोगों को खोजते-खोजते कौशाम्बी पहुंच गए। वह काफी मशक्कतों के बाद सिराथू तहसील के उस गांव में भी गए, जहां से वर्षों पहले उनके पुरखों को अंग्रेज सूरीनाम मजदूरी कराने ले गए थे। दादा की जुबानी गांव के बारे में जो सुना था, उसी के आधार पर उन्होंने अपनी खोज शुरू की।
हालांकि, अभी हेंड्रिक अपने वंशजों तक तो नहीं पहुंच सके, लेकिन उस मिट्टी को खोज निकाला, जिसमें उनकी जड़े हैं। मालटा से प्रयागराज आए हेंड्रिक ने बताया कि इस काम में उनकी एक स्थानीय व्यापारी ने मदद की, जिससे वह फेसबुक के जरिए जुड़े थे। वह आठ मार्च को फिर कौशाम्बी जाएंगे और अपने लोगों की खोजबीन करेंगे।
सिराथू तहसील के कनवार गांव से 1895 में अंग्रेज बड़ी संख्या में गिरमिटिया मजदूरों को अपने साथ सूरीनाम में ले गए, जिसमें सीताराम लोध भी शामिल थे। तमाम यातनाएं झेलते हुए सीताराम ने अपने बच्चों और परिवार का भरण पोषण किया। सीताराम ही हेंड्रिक कालका (74) के दादा थे। हैंड्रिक ने बताया, जब वह 12 वर्ष के थे, तब उनके दादा का निधन हो गया था।