संत मोरारीबापू ने शनिवार को वटवृक्ष के महत्व के बारे में दोहावली के आधार पर बताया। कहा कि दोहावली में अंकित है कि वटवृक्ष पर फूल नहीं लगते। वह फूलता नहीं है। इसलिए कि वटवृक्ष के सप्तांग में फूल नहीं है। जो अहंकार न करे वही अक्षयवट है। इसकी जड़ें जितनी जमीन के अंदर जाती हैं, फैलती हैं, उतना ही वह ऊपर उठता है।
इसी तरह जिस व्यक्ति की जड़ें गहरी होती हैं, वह कभी अहंकार नहीं करता है। उसकी प्रतिष्ठा बड़ी है। वह अंदर से फूलते नहीं हैं, उनमें अहंकार नहीं आता है। छोटी जड़ों वाले लोग फूलते हैं, लेकिन जिसकी प्रतिष्ठा आसमान को छू रही होती है, वह अहंकार नहीं करते। उन्होंने सीता वट को सत्यवट, वृंदावन के वंशीवट को प्रेमवट है और कैलाश के शिव वट को करुणा वट के रूप में व्याख्यायित किया।