प्रेमभक्ति का जन ज्वार सोमवार की रात कुंभ सरीखे समागम में तब्दील हो गया। न थकने की फिक्र, न रास्ता भटकने की चिंता, जिसे जहां जगह मिलती गई, वहीं अपने सद्गुरु के नयनाभिराम दर्शन के लिए आतुर ठिठका नजर आया। मौका था संगम तट पर निरंकारी संत समागम का। गद्दी संभालने के बाद पहली बार यहां पहुंचीं सुदीक्षा माता ने दिलों को जोड़ने वाले सेतु बनाने का संदेश दिया।
परेड मैदान में अरसा बाद संत समागम के जरिए मानवता का यह मेला हर किसी के लिए अनुकरणीय बन गया। संगम नगरी में सेवा, सुमिरन और सत्संग का यह संगम हर मन की पीड़ा, पांवों की थकान हमेशा के लिए दूर कर देने वाला था। एक तरफ मुख्य मंच पर सहजता और ममता के भावों से भरी सुदीक्षा माता हर अनुयायी के अभिवादन को स्वीकार करती रहीं तो दूसरी ओर संगीतमय भजनों, लोक गीतों, कविताओं की प्रस्तुतियों में सद्गुरु की महिमा का बखान हर तन, मन को अभिसिंचित कर रहा था।