कुंभ की विविधता सिर्फ पंडालों या शिविरों तक सीमित नहीं, बल्कि संतों की रसोई में भी इसे चखा जा सकता है। खासकर विदेशी संतों के यहां तो बिना भारतीय मसालों से छौंका लगाए कुछ बनता ही नहीं। दाल, बाटी, चोखा, मटर-शाही पनीर की तो डिमांड रोज ही रहती है। संगम की रेती पर विदेशी संत और उनके यूरोपीय भक्तगणों का व्यंजन इन दिनों काली मिर्च, जीरा, हल्दी, इलायची, सरसों, मगरैल, अदरक के बिना अधूरा है। इसके अलावा संतों की रसोई का जायका बढ़ाने के लिए राजस्थान एवं गुजरात के खानसामे भी आए हैं।