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तस्वीरें: पूजा पाठ के साथ जनेऊ के अलग-अलग रूप रंग, नहीं जानते होंगे आप

Fri, 18 Jan 2019 08:33 AM IST
shubham पंकज प्रसून, अमर उजाला, प्रयागराज
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कुंभ की धरती पर हर कोई विलक्षण दिख रहा है। सबकी अलग-अलग वेशभूषा और परिधान है। किसी के शरीर पर भभूत की राख लिपटी है तो किसी का तन रुद्राक्ष की मालाओं से ढका है। कुछ ऐसे भी दिख रहे हैं जो एक साधरण सी धोती, हाथ मेें माला और शरीर पर जनेऊ धारण किए हुए हैं। जनेऊ के आकार,प्रकार और रंग अलग-अलग है।
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जनेऊ का हिंदू संस्कृति में आध्यात्मिक और सामाजिक दृष्टि से बहुत महत्व है। प्रतापगढ़ के श्यामानंद पांडेय यहां कल्पवास में है। उनका कहना है कि जितना आवश्यक उनके लिए वस्त्र धारण करना है, उससे कही ज्यादा जरूरी वह जनेऊ को मानते हैं। स्वामी हरिचैतन्य ब्रह्मचारी का कहना है कि कर्म की उपासना के लिए जनेऊ आवश्यक है। मनुष्य के जीवन मेें सभी संस्कारों के साथ जनेऊ संस्कार भी शामिल है।
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गोपीगंज से आए शिवमोहन ङ्क्षसह बताते हैं, जनेऊ पहनना जितना आवश्यक है, उसके अनुसार जीवनचर्या जीना कहीं आवश्यक है। पूजन में, नित्य क्रिया में जनेऊ का विशेष महत्व है, जिसका वह पालन करते हैं। रायबरेली से आए मोहन गुप्ता बताते हैं कि जब वह 16 वर्ष के थे तभी उनका जनेऊ संस्कार करा दिया गया था। उनके घर का माहौल धार्मिक होने की वजह से जनेऊ उनके जीवन में रच बस गया है।

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जनेऊ के धांगों से बंधे हैँ अलग-अलग वर्ण
शंकराचार्य स्वामी नरेंद्रानंद सरस्वती बताते हैं कि मूंज, सूत-कपास और रेशम, इन सभी से जनेऊ  बनाकर पहनने की परंपरा है। ब्राह्मण मूंज के धागे का जनेऊ धारण करते हैं। चौपाई भी है कि, कांधे मूंज जनेऊ साजे। हाथ की अंगुलियों में 96 बार लपेटकर उतने मूंज से बनाया गया जनेऊ ब्राह्मणों को पहनना चाहिए।
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इसे 96 चौआ भी कहते हैं। यानी चारों उंगलियों में लपेटकर बनाया गया। उन्होंने बताया कि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य में जनेऊ संस्कार की उम्र भी निर्धारित है। इसी तरह जनेऊ पहनने में जो अर्थ निहित उसमें 80 प्रतिशत कर्म और 16 प्रतिशत उपासना शामिल होती है। 

 
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