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सीएम योगी के दर्शन से पहले अक्षयवट पर मतभेद, पतालपुरी के महंत बोले- आस्था के नाम पर हो रही राजनीति

Fri, 04 Jan 2019 11:59 AM IST
Amit Saini न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
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मूल अक्षयवट के दर्शन के लिए पांच जनवरी को गेट खोले जाने की तैयारी है। इसकी शुरुआत स्वयं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कर सकते हैं। इसी तैयारियों का जायजा लेने मुख्य सचिव, अपर मुख्य सचिव, डीजीपी समेत कई प्रमुख सचिव बृहस्पतिवार को कुंभ मेला क्षेत्र पहुंचे। इसी बीच अक्षयवट पतालपुरी के प्रबंधक महंत रवींद्र नाथ योगेश्वर ने मूल अक्षयवट और अक्षयवट पतालपुरी को लेकर एक बड़ा बयान दिया है। 
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महंत रवींद्र नाथ योगेश्वर का कहना है कि, 'मूल अक्षयवट के नाम पर सरकार राजनीति कर रही है। अनादी काल से लोग अक्षयवट पतालपुरी के दर्शन-पूजन करते आ रहे हैं। जिसे मूल अक्षयवट बताया जा रहा है, जो सेना के घेरे में है, वह कभी खुला ही नहीं था। उसकी कोई मान्यता भी नहीं है। यह राजनीति दांव-पेंच के तहत हिन्दुओं की आस्था से खिलावाड़ किया जा रहा है। अक्षयवट पतालपुरी के प्रमाण आज भी उपस्थित हैं, जिससे पता चलता है कि जो अक्षयवट पतालपुरी में है वहीं मूल अक्षयवट है।'

 
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बता दें कि, संगम तीरे स्थित अकबर के किले का एक बड़ा हिस्सा इस वक्त सेना के पास है। इसी क्षेत्र में मूल अक्षयवट मौजूद है। जिस अक्षयवट को पांच जनवरी को खोले जाने की बात की जा रही है और जिसे मूल अक्षयवट बताया जा रहा है, वह 16 दिसंबर को प्रधानमंत्री पीएम मोदी के दर्शन के बाद चर्चा में आया है। पीएम मोदी के निर्देश के बाद ही इसे 5 जनवरी से आम जनता के लिए खोला जाने वाला है। इसकी शुरुआत स्वयं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ करेंगे।

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वहीं इस मामले में अक्षयवट पतालपुरी के उप प्रबंधक मुकेशनाथ गोस्वामी ने अमर उजाला के साथ बातचीत में विस्तार से बताया। मुकेशनाथ गोस्वामी ने कहा कि अक्षयवट पतालपुरी की मान्यता पिछले चार युगों से चली आ रही है। हालांकि, इसे लेकर कई बार विवाद हुआ लेकिन हर बार इसे ही मूल अक्षयवट के रूप में मान्यता दी गई। मुकेशनाथ गोस्वामी ने बताया कि 1928 में अंग्रेजी हुकूमत के वक्त गजट पास हुआ था, जिसमें अक्षयवट पतालपुरी को मूल अक्षयवट की मान्यता दी गई थी। इसकी मान्यता को लेकर विवाद 1950 में वकील से प्रयागराज के विधायक बने शिवनाथ काटजू और इतिहासकार डॉ. ईश्वरी प्रसाद के आपसी विवाद से शुरू हुआ था। इसके बाद 1956 में जांच की गई, उस जांच में भी इसे मूल अक्षयवट की मान्यता मिली। इसके बाद 1968 और 1994 में भी गजट निकला और दोनों बार अक्षयवट पतालपुरी को ही मूल अक्षयवट की मान्यता दी गई।
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उप प्रबंधक मुकेशनाथ गोस्वामी ने अक्षयवट पतालपुरी की मान्यता के बारे में बताते हए कहा कि, यह अनादी काल से लोगों की आस्था का केंद्र रहा है। इस स्थान के बारे में 644 ई. में राजा हर्षवर्धन के शासनकाल में भारत आया चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी अपनी यात्रा वृतांत में इसका वर्णन किया था। हालांकि, कई लोगों का कहना है कि विवाद की असली जड़ मंदिरों में चढ़ाया जाने वाला चढ़ावा है। मूल अक्षयवट के खुलने के बाद अक्षयवट पतालपुरी आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में कमी आएगी, जिससे मंदिर के चढ़ावे में भी कमी होगी।
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