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Mahakumbh 2025: नन्हे नागा संन्यासी का तप देख यकीन करना होता है मुश्किल, जानिए इनकी दुनिया है कैसी

सार

नन्हे कदम अपने सनातन की रक्षा की ओर आगे बढ़ते हुए। पूरे शरीर पर भभूति जीवन की सत्यता का अहसास कराती है कि सबकुछ क्षणभर के लिए है। धर्म की रक्षा के लिए हाथों में हथियार और गले में माला। किसी बच्चे को जब आप इस तरह देखते हैं तो आंख और दिमाग के बीच में संतुलन बनाना थोड़ा मुश्किल हो जाता है, लेकिन सच तो सच है। आवाहन अखाड़े की पेशवाई महाकुंभ से लौटने के बाद काशी में निकली और एक नागा संन्यासी की तस्वीर ने मेरा ध्यान अपनी ओर खींचा। इसके बाद नन्हे नागा संन्यासियों की दुनिया के बारे में जानने की इच्छा हुई। 
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15 वर्षीय दक्षगिरी महाराज - फोटो : अमर उजाला
नन्हे नागा संन्यासी अपने आप में एक ऐसा विषय है जिसको समझना आसान नहीं था। इसके बारे में जानने के लिए आवाहन अखाड़े के अधिकारियों से संपर्क किया गया लेकिन संपर्क नहीं हो पाया। इसके बाद महाकुंभ में आए एक और नन्हे साधु के बारे में जानने के लिए निरंजनी अखाड़े से जानकारी ली गई। यहां पर एक 15 साल के नन्हे नागा ने सभी का ध्यान अपनी ओर खींचा था। उनका नाम था दक्षगिरी महाराज, उम्र 15 साल। महज पांच साल की उम्र में इन्होंने संन्यास लेने का मन बना लिया था और अब संन्यासियों की दुनिया में यह 10 साल बिता चुके हैं। 
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15 वर्षीय दक्षगिरी महाराज - फोटो : अमर उजाला
15 वर्षीय दक्षगिरी महाराज ने खुद इस बात की जानकारी दी कि वह हरियाणा के हिसार जिले के रहने वाले हैं। जब महज पांच साल के थे तो उनका ध्यान पूजा पाठ करने में लगता था। पिता का निधन हो चुका था। जब वह पांच वर्ष के थे तभी उन्होंने अपनी मां से साधु बनने की इच्छा जाहिर कर दी थी। कुछ सोचने समझने के बाद उनकी मां ने भी इसमें उनका सहयोग किया। इसके बाद घर छोड़ने का निर्णय हुआ और आगे का सफर निरंजनी अखाड़े के साथ प्रारंभ हो गया। अब उनके इस सफर को 10 वर्ष बीत चुके हैं और वो अपने आप को धर्म की रक्षा करने के लिए तैयार कर रहे हैं।
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15 वर्षीय दक्षगिरी महाराज - फोटो : अमर उजाला
इनके गुरु नागा संन्यासी अजय गिरि महाराज ने बताया कि सामाजिक जीवन में कुछ लोग कई प्रकार की समस्याओं से जूझ रहे होते हैं। ऐसे में वो लोग भी हमसे संपर्क करते हैं जो निसंतान होते हैं। ऐसे लोगों को जब ईश्वर की कृपा से संतान की प्राप्ति होती है तो वो अपने अनेक बच्चों में एक बच्चे को सनातन की रक्षा के लिए समर्पित कर देते हैं। ऐसे बच्चों को अखाड़ों में और पीठों के माध्यम से धर्म की शिक्षा दी जाती है। इन्हें शस्त्र और शास्त्र का ज्ञान दिया जाता है। जब ये अपने काम में पूरी तरह से निपुण हो जाते हैं तो फिर इन्हें सनातन के प्रचार-प्रसार और रक्षा में लगा दिया जाता है। 
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15 वर्षीय दक्षगिरी महाराज - फोटो : अमर उजाला
उन्होंने ये भी बताया कि इन्हें शस्त्र चलाना सिखाया तो जाता है लेकिन इस उम्र में शस्त्र रखने का अधिकार नहीं दिया जाता। अखाड़े की पेशवाई के समय ये शस्त्र को हाथों में ले सकते हैं। इसके साथ ही इनकी धार्मिक शिक्षा का विशेष ध्यान रखा जाता है। ये सार्वजनिक जीवन में अपने गुरु के संरक्षण में रहते हैं। इन नन्हे नागाओं के लिए इनके गुरु ही इनका सब कुछ होते हैं, उनके आदेश का पालन करना ही इनके जीवन का ध्येय रहता है।

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