देश का पहला यमुना एक्सप्रेस वे हादसे दर हादसे के कारण मौत का एक्सप्रेस वे बन गया है। इस पर आठ साल में नौ सौ लोगों की जान जा चुकी है, जबकि छह हजार से ज्यादा घायल हुए हैं। साल दर साल हादसों की संख्या कम होने के बजाय बढ़ती जा रही है।
विज्ञापन
2 of 7
खाई में गिरी बस
- फोटो : अमर उजाला
सोमवार तड़के हुई दुर्घटना में मृतकों की संख्या (29) मिला दें तो इस साल अब तक 140 से ज्यादा की जान एक्सप्रेसवे पर जा चुकी है। औसत देखें तो 72 घंटे भी ऐसे नहीं गुजर रहे जब कोई हादसा न हो रहा है। रात में स्थिति और खराब है। सूरज निकलने से ठीक पहले जब नींद का जोर सबसे ज्यादा होता है, उसी समय हादसे भी ज्यादा हो रहे हैं।
विज्ञापन
3 of 7
यमुना एक्सप्रेसवे
- फोटो : अमर उजाला
आगरा डेवलपमेंट फाउंडेशन के अध्यक्ष केसी जैन ने 2015 में हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर हादसों को रोकने के लिए उपाय करने के लिए कहा था। तब हाईकोर्ट के आदेश पर उच्च स्तरीय समिति गठित की गई। डेथ ऑडिट कराया गया। इसमें हादसों के कारण सामने आए। लेकिन हादसों की संख्या कम नहीं हुई।
4 of 7
आगरा बस हादसे की तस्वीरें
- फोटो : अमर उजाला
पिछले दो साल में यह बात भी सामने आई है कि सबसे ज्यादा हादसे तड़के तीन से पांच बजे के बीच हो रहे हैं। इस समय नींद का जोर सबसे ज्यादा होता है। आगरा क्षेत्र में झरना नाला, खंदौली टोल प्लाजा से पहले ज्यादा हादसे हो रहे हैं।
विज्ञापन
5 of 7
यमुना एक्सप्रेसवे
मथुरा क्षेत्र में बलदेव, मांट, नौहझील और सुरीर में हादसों की संख्या ज्यादा है। नोएडा की तरफ आने पर जेवर में हादसे ज्यादा हो रहे हैं। 165 किमी. लंबा यह एक्सप्रेसवे अगस्त, 2012 में चालू किया गया था। इसका फायदा यह हुआ कि आगरा और दिल्ली के बीच की दूरी कम हो गई। समय कम लगने लगा है लेकिन हादसे भी उतने ही अधिक हो रहे हैं।
दो साल पहले एक्सप्रेसवे पर हो रही मौतों का डेथ ऑडिट कराया गया था। वाहनों की तेज रफ्तार अधिकांश हादसों की वजह पाई गई थी। एक्सप्रेसवे पर रफ्तार की सीमा तय है। छोटे-बड़े वाहनों के लिए अलग-अलग सीमा है लेकिन लोग रफ्तार की सुई पर ध्यान नहीं देते। रात के समय तो रफ्तार और ज्यादा रहती है। ऐसे में कोई व्यवधान आए तो वाहन को नियंत्रित करना मुश्किल हो जाता है।