ताजमहल के एक से बढ़कर एक शानदार फोटो खींचने वाले फोटोग्राफर पहली बार विश्व फोटोग्राफी दिवस पर परेशान हैं। हर साल ये अपनी तस्वीरें सैलानियों को दिखाते थे। इस बार कोरोना के कारण ताजमहल बंद है। इनका कहना है कि ताजमहल बंद होने से कैमरे भी बंद हैं, कमाई का कोई और जरिया नहीं, बच्चों को फीस भी नहीं भर पा रहे हैं। कोरोना काल में उनकी जिंदगी की तस्वीर बदरंग सी हो गई है।
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ताजमहल में पसरा सन्नाटा
- फोटो : Amar Ujala
ग्वालियर रोड निवासी प्रभाकर सिंह पाल (65) ने अपनी जिंदगी के 45 साल ताजमहल में फोटोग्राफी करते हुए बिताए हैं। उनका कहना है कि ऐसा मंजर कभी नहीं देखा। पिछले पांच माह से घर बैठे हुए हैं। जिंदगी भर आत्मनिर्भर रहने वाले प्रभाकर को बच्चों पर निर्भर रहना पड़ रहा है। कुछ ऐसे ही हालातों का सामना 500 फोटोग्राफरों के समक्ष खड़ा हुआ है।
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ताजमहल
- फोटो : अमर उजाला
भारतीय पुरात्व सर्वेक्षण (एएसआई) के फोटोग्राफर प्रभाकर सिंह पाल ने बताया कि कभी न सोचा था ऐसा दिन आएगा। ताजमहल बंद होने के शुरुआती कुछ दिन तो लगा कि धीरे धीरे सब ठीक हो जाएगा। मगर, समय के साथ उम्मीद भी कम होती गई। इस समय एक रुपये की भी आमदनी नहीं है। अपने दो बेटों पर निर्भर हो गया हूं।
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ताजमहल
- फोटो : अमर उजाला
ताजमहल फोटोग्राफी एसोसिएशन के अध्यक्ष मदन वर्मा ने बताते हैं कि मुझे इस क्षेत्र में करीब 30 साल हो गए हैं। इतना समय खराब होगा, कभी कल्पना भी नहीं की थी। परिवार की भी जिम्मेदारी है। जो जमा पूंजी थी, उसी से जैसे तैसे काम हो रहा है। आगे क्या होगा, कुछ पता नहीं है। अगर स्मारक खुलते भी हैं, तो एक दम से कुछ सही नहीं होने वाला है।
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ताजमहल
- फोटो : अमर उजाला
मोहम्मद सबा मुघनी ने कहा कि फोटोग्राफी के पेशे में मेरे पिताजी थे, उनसे मैंने सीखा। मेरे परिवार के ही अन्य सदस्य भी इससे जुड़े हुए हैं। ताजमहल बंद होने के बाद जिंदगी की कड़वी हकीकत देखने को मिली है। आलम ये है कि बच्चों की फीस भरने तक के पैसे नहीं है। जो बचत थी वो भी खत्म होने को है।
ताजगंज निवासी फोटोग्राफर संदीप शिवहरे ने बताया कि हालात का अंदाजा यहीं से लगाया जा सकता है कि घर खर्च चलाने के लिए आभूषण तक बेचने पड़े हैं। घर में पूरे परिवार की जिम्मेदारी है। जमा पूंजी खत्म हो चुकी है। अपने 29 साल के करियर में ये स्थिति पहली बार देखने को मिली है।