आगरा में कोरोना वायरस से जंग लड़ रहे सेहत के सिपाही 24 घंटे अलर्ट पर हैं। इनका घर पहुंचने का समय कोई निश्चित नहीं है। बीते एक महीने से यही हाल है। कोई छुट्टी तक नहीं मिल रही है। कभी-कभी घर पहुंचते ही फोन आ जाता है कि अस्पताल पहुंचो, ऐसे में बिना झुंझलाहट और समय गंवाए अस्पताल की ओर दौड़ पड़ते हैं।
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डॉ. आरती अग्रवाल
- फोटो : अमर उजाला
अस्पताल ही बन गया है दूसरा घर
एसएन मेडिकल कॉलेज के माइक्रोबायोलॉजी विभाग की अध्यक्ष डॉ. आरती अग्रवाल ने बताया कि कोरोना वायरस के चलते बीते एक डेढ़ महीने से अस्पताल दूसरा घर बन गया है। लोगों के नमूने लेने, स्क्रीनिंग करने के साथ समेत उनकी सैंपलिंग की रिपोर्ट अपडेट रखनी होती हैं।
सुबह 8:00 बजे से रात के 10-12 बजे तक भागदौड़ में बीत जाता है। पति डॉक्टर हैं, वह समझते हैं लेकिन बच्चे बार-बार फोन करके घर आने की पूछते हैं। जब मैं बेटे को कोरोना वायरस की महामारी के बारे में बताती हूं तो कहते हैं, ठीक है मम्मी आप काम करते रहो लेकिन अपना ख्याल रखना।
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जूनियर रेजिडेंट अभिषेक कुमार
- फोटो : अमर उजाला
बेटा अपना ध्यान रखते हुए काम करना
मेडिसिन विभाग के जूनियर रेजिडेंट अभिषेक कुमार कहते हैं कि जांच के लिए लोगों के नमूने लेने और स्क्रीनिंग के कार्य के बारे में परिजन पूछते रहते हैं। फिक्र करते हैं, लेकिन डॉक्टरी का फर्ज जानते हुए ऐसे ही काम करते रहने को प्रेरित करते है।
वो यह जरूर कहते हैं कि बेटा पूरी किट पहनकर ही काम करना और अपना ख्याल जरूर रखना। पिछले एक महीने से ज्यादा काम हो गया है, लेकिन पूरे मन से जिम्मेदारी बखूबी निभा रहे हैं। ऐसे वक्त में आप केवल अपनी फिक्र कर भी कैसे सकते हैं। चाहे वो कोई भी हो।
कई घंटे तक पीपीई किट पहननी पड़ती है
मेडिकल कॉलेज के टेक्निकल असिस्टेंट माधव अग्रवाल ने बताया कि कोरोना वायरस की जांच के लिए सैंपलिंग बेहद चैलेंजिंग वर्क है लेकिन हमें इसकी पहले से ही ट्रेनिंग दी जाती है। कई घंटे पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट (पीपीई) किट पहनकर रहना पड़ता है। फोन पर बात नहीं हो पाती है।
सुबह 8:00 बजे घर से निकलते हैं, फिर पता नहीं घर कब पहुंचेंगे। दोस्त भी फोन करके संभलकर कार्य करने की हिदायत देते हैं। देर होने पर घर से फोन पर पूछते हैं कि तुम ठीक तो हो, कब तक घर आ जाओगे। बस मैं यही कहता कि बस कुछ देर लगेगी।
आइसोलेशन वार्ड की तीन बार सफाई
जिला अस्पताल के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी प्रदीप कुमार ने बताया कि आइसोलेशन वार्ड की दिन में तीन बार सफाई करनी पड़ रही है। किट पहन कर क्लीनिकल वॉश करते हैं, इसमें बेड, बाथरूम, फर्श दीवार, हैंडल सभी की सफाई करने में करीब एक घंटा लग जाता है।
घर वालों को पता चला कि मैं आइसोलेशन वार्ड की सफाई करता हूं तो वह चिंतित होते हैं। घर से निकलते वक्त बस यही कहते हैं कि संभाल के काम करना। जब मैं उनको बताता हूं कि कई डॉक्टर और स्टाफ भी दिन-रात इसी में लगे हुए हैं तब उनका डर थोड़ा कम होता है।