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अपनों ने भुलाया तो कविताएं-गीत लिखकर कम की यादों की टीस, पढ़िए इन बुजुर्गों की दिल छूने वाली खबर

Thu, 10 Dec 2020 08:11 AM IST
Abhishek Saxena सिद्धार्थ चतुर्वेदी, अमर उजाला, आगरा
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रामलाल वृद्धाश्रम में बैठे बुजुर्ग - फोटो : अमर उजाला
अकेलापन सालता है, कमरे में बैठे हुए अपनों की यादों से आंखें नम हो जाती हैं और गीत बनने लगता है। यादों से उभरी टीस खत्म तो नहीं होती लेकिन गीतों-कविताओं से यह कुछ कम हो जाती है। ये शब्द हैं रामलाल वृद्धाश्रम में रह रहे बुजुर्गों के। दर्द को कम करने के लिए गीत-कविताओं का सृजन कर अपनों को याद करते हैं। किसी बुजुर्ग ने 24 तो दूसरे ने पचास से अधिक कविताएं लिखी हैं। शाम को आश्रम में गोष्ठी होती है। दर्द के बीच हास्य की कविताएं मुस्कान भी बो देती हैं। अगली स्लाइड में पढ़िए इनकी मर्मस्पर्शी कहानी...
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हेमंत चतुर्वेदी - फोटो : अमर उजाला
तुम कहां खो गए...
‘तुम कहां खो गए, बस यादों में रह गए, अब यहां कुछ कमी, नहीं है’ कविता सुनाते-सुनाते 64 साल के हेमंत चतुर्वेदी की आवाज भर आई, आंखों की कोर गीली हो गईं। बटेश्वर निवासी हेमंत चतुर्वेदी पिछले तीन साल से आश्रम में हैं। आश्रम में आने के बाद बीस से अधिक कविताएं लिख चुके हैं। वह हिंदी और अंग्रेजी के अलावा बंगाली भाषा में भी कविताएं लिख रहे हैं। बोले कि अपनों से दूर होने का दर्द कुछ देर के लिए दूर हो जाता है।
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गोपीचंद शर्मा - फोटो : अमर उजाला
‘माटी के पुतले, काहै को बिसारा हरिनाम...’
ग्वालियर निवासी 81 साल के गोपीचंद शर्मा का दर्द उनके शब्दों में दिखा। कुछ गुनगुनाया और चुप हो गए। एकाएक बोले,  45 साल तक एक प्राइवेट स्कूल में बच्चों को पढ़ाया। अपनों से दूर हूं, अब तो भजन-गीत ही सहारा रह गए हैं। उनके लिखे भजन...‘माटी के पुतले, काहै को बिसारा हरिनाम, इस जीवन का कौन भरोसा, सुबह जाए और शाम को’ की पंक्तियां आश्रम में दूसरे बुजुर्ग भी गुनगुनाते हैं। 

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मोहन सिंह वर्मा - फोटो : अमर उजाला
लेखन सहारा, शांति देता है...
‘एक तरफ मैं सज रहा था, एक तरफ तुम सज रहीं थीं। नए कपड़े तुमने भी पहने थे, नए कपड़े मैंने भी। दो फूल तुम्हारे ऊपर थे, दो फूल मेरे ऊपर। फर्क सिर्फ इतना था कि तुम बालम के घर जा रहीं थीं, मैं शमशान’। 
यह गीत भरतपुर निवासी मोहन सिंह वर्मा ने सुनाया। मौजूद लोग भावुक हो गए। 57 साल के वर्मा पिछले डेढ़ साल से आश्रम में रह रहे हैं। परिवार की बात नहीं करते। सवाल किया तो चुप हो गए। कहा, लेखन सहारा, शांति देता है।
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डॉ. अनिल सक्सेना - फोटो : अमर उजाला
श्रीकृष्ण चरित मानस लिख रहे अनिल 
डॉ. अनिल सक्सेना डीएस कॉलेज अलीगढ़ में अंग्रेजी के प्रवक्ता रहे हैं। 54 साल उम्र है। शादी नहीं की। आश्रम में रहकर श्रीमद्भागवत गीता पर कई आलेख लिखे हैं। इस समय वह श्रीकृष्ण चरित मानस के लेखन कार्य में जुटे हैं। बोले कि उनका श्रीमद्भागवत गीता के आलेख प्रकाशित कराने का मन है, पर आर्थिक दिक्कत से यह संभव नहीं है। 
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