बचपन में लड़खड़ाते कदमों को जिसने सहारा दिया था आज बुढ़ापे में वे खुद बेसहारा हैं। भले ही अपनों ने उन्हें सड़क पर छोड़ दिया है, लेकिन समाज कल्याण की ओर से संचालित वृद्धाश्रम ने उनके लड़खड़ाते कदमों को थाम लिया है। यहां सारी सुविधाएं होने के बाद भी उनके दिल में एक कसक बाकी है, वह कसक है अपनों की जो शायद कभी खत्म न हो।
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वृद्धाश्रम में रह रहीं बेलाहार निवासी मीरा देवी
- फोटो : अमर उजाला
शहर के दीवानी रोड स्थित वृद्धाश्रम में रह रहीं बेलाहार निवासी मीरा देवी के आसपास भले ही कई लोग रहते हैं, लेकिन अपनों की याद उन्हें इस भरी महफिल में भी अकेला कर देती है। एक बेटा और दो बेटी के भरे परिवार में भी मीरा देवी को दो वक्त की रोटी नसीब नहीं हो सकी।
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वृद्धाश्रम में रह रहे बुजुर्ग मोहम्मद शफीक
- फोटो : अमर उजाला
ऐसा ही हाल भोगांव निवासी मोहम्मद शफीक का भी है। वृद्धाश्रम के केयरटेकर को वह शहर के करहल चौराहे पर पड़े हुए मिले थे, तब वह बहुत बीमार था। उन्होंने बताया कि उनके दो बेटे हैं और वे टेलर हैं। लेकिन दोनों ही ने उन्हें रखने से साफ इनकार कर दिया। इसके बाद से घर से निकल आए थे। भूख प्यास से हालत बिगड़ती गई और बेहोश होकर चौराहे पर गिर पड़े। जहां से उन्हें वृद्धाश्रम लाया गया। वे तो अब उस केयरटेकर को ही अपना बेटा मानते हैं। वे कहते हैं कि अगर अब परिवार उन्हें लेने आ भी जाए तो भी वे न जाएंगे।
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गंगाशरण
- फोटो : अमर उजाला
किशनी के गांव टिकसुरी निवासी गंगाशरण का दर्द भी कुछ ऐसा ही है। तीन बेटों में से दो बेटे सरकारी सेवा में है तो एक प्राइवेट नौकरी करता है। लेकिन इतना सब होने के बाद भी उनके बेटों के पास दो वक्त की रोटी नहीं थी। जिससे मजबूरन उन्हें वृद्धाश्रम आना पड़ा। अपने बेटों की बात करते-करते उनकी आंखों से आंसू छलक पड़ते हैं। ये दर्द यहां रहने वाले किसी एक दो का नहीं बल्कि यहां रहने वाले 58 बुजुर्गों का है।
वृद्धाश्रम में रहने वाले बुजुर्गों ने अब इसे ही अपना संसार बना लिया है। यहां रहने वाली विद्यावती कहती हैं कि यहां सब एक ही उम्र के हैं, तो आपस में बातचीत कर अपना सुख दुख बांटते रहते हैं। अब तो कोई घर वापस लेने के लिए भी आ जाए तो भी नहीं जाएंगे। क्योंकि अब यही हमारा संसार है।