राजनीतिक दांव-पेच तथा इसके नफा-नुकसान मुलायम सिंह के अनुभव के आगे बहुत ही छोटी बातें हो चली थीं। राजनीति से परे हटकर संबंध निभाने में भी उनका कोई मुकाबला नहीं था। वही कल्याण सिंह, जिनसे प्रदेश की राजनीति में उनका धुर विरोध रहा, उनको जरूरत पड़ी तो मुलायम सिंह एक यार और असली मददगार बनकर उनके साथ खड़े हो गए।
ऐतिहासिक थी जनसभा
वर्ष 2009 में एटा लोकसभा सीट पर सपा का प्रत्याशी नहीं उतारा। कल्याण सिंह को जिताने में पूरी ताकत लगा दी। उनके साथ ऐतिहासिक जनसभा की, जो पूरे देश की राजनीति में यादगार बन गई। मुलायम सिंह से मिले इस अपनेपन से पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह भी गदगद थे और अपने भाषणों में मंच से उनकी तारीख करते थे। भाजपा से अनबन के बीच कल्याण सिंह ने 2009 में पार्टी छोड़ दी थी। निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में एटा से चुनाव लड़ने आए। सपा ने उन्हें समर्थन दिया।
विज्ञापन
2 of 5
देवेंद्र यादव
- फोटो : अमर उजाला
सपा के इस कदम से आहत होकर पूर्व सांसद कुंवर देवेंद्र सिंह ने बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ा। जो कल्याण सिंह के मुख्य प्रतिद्वंद्वी रहे। वहीं भाजपा से डॉ. श्याम सिंह शाक्य प्रत्याशी रहे थे। भाजपा के ही सच्चे सिपाही माने जाने वाले डॉ. महादीपक सिंह शाक्य कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ रहे थे।
विज्ञापन
3 of 5
कल्याण सिंह और मुलायम सिंह
- फोटो : अमर उजाला
कल्याण सिंह ने भले ही भाजपा छोड़ दी थी, लेकिन इस लोधी बाहुल्य लोकसभा क्षेत्र में उनका जादू सर चढ़कर बोल रहा था। इसके साथ ही मुलायम सिंह के साथ ने उनकी झोली में यादव वोट भर दिए। जबरदस्त वोट पाकर वह संसद पहुंच गए।
4 of 5
मुलायम सिंह यादव
- फोटो : अमर उजाला
चुनाव के दौरान पूर्व मुलायम सिंह यादव ने उनके समर्थन में शहर स्थित राजकीय इंटर कॉलेज के मैदान पर जनसभा को संबोधित किया था। कल्याण सिंह के लिए सभी वर्ग के लोगों से खुलकर मतदान करने की अपील की थी।
मुलायम सिंह यादव के साथ धर्मेंद्र यादव (फाइल)
- फोटो : अमर उजाला
मुलायम सिंह यादव की इस अपील का असर भी हुआ और कल्याण सिंह को कुल मतों में से लगभग आधे (48.57 फीसदी) मत मिले थे। जबकि आधे मत अन्य 18 उम्मीदवारों में बंटे थे।