रणभेरी बज चुकी है। चुनावी मैदान तैयार है। रणनीति बन रही हैं। ब्रज में मुकाबला दिलचस्प है। एक तरफ एयर स्ट्राइक से बने माहौल पर सवार भाजपा है तो दूसरी ओर गठबंधन के गणित पर सवार होकर उतरे सपा और बसपा के महारथी हैं। आगरा मंडल की पांच सीटों पर एक एक वोट के लिए रस्साकसी होने वाली है। यहां कोई किसी से कम नहीं है। भाजपा, सपा, रालोद, बसपा के पास परंपरागत वोटों की ताकत है तो कांग्रेस के पास सुनहरा इतिहास है। उम्मीद सबके पास है लेकिन चुनौतियां भी सभी के सामने हैं.....
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अक्षय यादव और शिवपाल यादव
- फोटो : अमर उजाला
अक्षय यादव और शिवपाल यादव (फाइल)
शिवपाल की प्रसपा का कितना असर ?
शिवपाल यादव भी सैफई परिवार से हैं। समाजवादी पार्टी से अलग होकर प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) बना ली है। फिरोजाबाद से वह खुद ताल ठोकने का एलान कर चुके हैं। उनके सामने सपा के अक्षय यादव होंगे। वो चुनाव में कितना असर डाल पाते हैं? इससे किसे फायदा होगा और किसे नुकसान?
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मुलायम सिंह यादव
- फोटो : amar ujala
मुलायम सिंह यादव (फाइल)
मुलायम का हाथ किसके साथ ?
मैनपुरी सीट से सपा ने मुलायम सिंह यादव को उम्मीदवार बनाया है। वो संसद भवन में बयान दे चुके हैं, हम चाहते हैं कि अगली बार भी नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनें। वो बात पीछे छूट गई। अब देखना है कि शिवपाल और अखिलेश में से मुलायम किसका साथ देते हैं।
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प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राजबब्बर
- फोटो : amar ujala
राज बब्बर (फाइल)
सीकरी से क्यों हटा राज बब्बर का नाम?
कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर का नाम फतेहपुर सीकरी लोकसभा सीट से चला। वो सक्रिय भी हुए। इसके बाद अचानक से नाम हट गया। आखिर इसकी क्या वजह रही? अब कहा जा रहा है कि वो मुरादाबाद से लड़ेंगे।
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फाइल फोटो
फाइल फोटो
विधायकों की नाराजगी कैसे दूर करेगी भाजपा ?
आगरा, फतेहपुर सीकरी लोकसभा क्षेत्र के कई विधायक नाराज बताए जा रहे हैं। कोई सांसद से नाराज है तो कोई मंत्री न बनाए जाने से। अगर इनकी मर्जी से प्रत्याशी नहीं आए तो क्या ये लोग सहयोग करेंगे? यह देखने वाली बात होगी।
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सांसद चौधरी बाबूलाल और सांसद रामशंकर कठेरिया
- फोटो : अमर उजाला
सांसद चौधरी बाबूलाल और रामशंकर कठेरिया (फाइल)
भाजपा में क्या गुल खिलाएगी नेताओं की गुटबाजी ?
आगरा भाजपा में गुटबाजी खुल्लम खुल्ला है। कभी सांसद रामशंकर कठेरिया और सांसद चौधरी बाबूलाल में 36 का आंकड़ा तो कभी एसपी सिंह बघेल और कठेरिया के बीच अनबन की बातें। कभी मेयर नवीन जैन और जगन गर्ग में नाइत्तफाकी। अब चुनाव आ गया है। देखना है कि हाईकमान के पास गुटबाजी की बीमारी के लिए क्या इलाज है?
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जयंत चौधरी
जयंत चौधरी (फाइल)
जयंत के न लड़ने का क्या पड़ेगा असर ?
मथुरा से जयंत चौधरी दो बार चुनाव लड़े। 2009 में जीते। 2014 में हार गए। इस बार गठबंधन में मथुरा सीट रालोद को मिली है लेकिन जयंत चुनाव नहीं लड़ेंगे। वो बागपत से उम्मीदवार हैं। ऐसे में मथुरा से रालोद किसे उतारेगी, सबकी इस पर निगाहें हैं।
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सीमा उपाध्याय और उनके पति पूर्व मंत्री रामवीर उपाध्याय
सीमा उपाध्याय और उनके पति पूर्व मंत्री रामवीर उपाध्याय
सीमा के मैदान से हटने की कैसे होगी भरपाई ?
फतेहपुर सीकरी से बसपा उम्मीदवार सीमा उपाध्याय चुनाव मैदान से हट गईं। साल भर से तैयारी कर रहीं थी। अब अचानक मैदान छोड़ गई । जाहिर है अच्छा संदेश नहीं गया। बसपा इसकी भरपाई कैसे करेगी? जो उम्मीदवार आएगा, उसके लिए दिक्कत आ सकती है।
एक तरफ गठबंधन ने सोशल इंजीनियरिंग की है। यहां जाट, मुस्लिम, यादव, अनुसूचित जाति के वोट बड़ी संख्या में हैं। इन पर गठबंधन की नजर है। इनमें उम्मीदवार की जाति के वोट और जुड़े तो सोने पर सुहागा होगा, ऐसा गठबंधन के रणनीतिकार बता रहे हैं। दूसरी ओर भाजपा का सियासी कौशल है। तमाम कार्यक्रम बनाए जा रहे हैं, लाभार्थियों को लुभाने की योजनाए हैं। साथ ही, दूसरे दलों के कई नेताओं को तोड़ा जा सकता है।