करवाचौथ का व्रत गुरुवार को देश भर में मनाया जाएगा। चांद निकलने पर जब सुहागिनें उसे अर्घ्य देंगी तो यूपी में एक गांव ऐसा भी है जहां उस वक्त मायूसी छाई रहेगी। हम बात कर रहे हैं उत्तर प्रदेश के जनपद मथुरा के कस्बा सुरीर की। यहां सुहाग की सलामती के लिए करवाचौथ के व्रत से परहेज रखने की रूढ़िवादी परंपरा सैकड़ों सालों से चली आ रही है। दरअसल सती के श्राप का भय इस कदर सभी के मन-मस्तिष्क पर छाया हुआ है कि महिलाएं करवाचौथ का त्योहार नहीं मनाती।
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मथुरा के गांव सुरीर में एक सती का बना मंदिर
- फोटो : अमर उजाला
सुरीर के मोहल्ला वघा में ठाकुर समाज के सैकड़ों परिवारों में करवाचौथ और अहोई अष्ठमी का त्योहार मनाने पर सती के श्राप की बंदिश लगी हुई है। करवाचौथ का व्रत नहीं रख पाने की कसक इस समाज की नवविवाहितों को अक्सर कचोटती रहती है।
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स्थानीय निवासी पूजा
- फोटो : अमर उजाला
स्थानीय नागरिक पूजा का कहना है कि मन में तमन्ना थी कि शादी के बाद पहले करवाचौथ पर वह निर्जला व्रत एवं सोलह श्रृंगार कर अपने चांद का दीदार करेंगी लेकिन ससुराल में आकर पता चला कि सती के श्राप की बंदिश से ऐसा नहीं कर पाएगी।
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विवाहिता रेखा
- फोटो : अमर उजाला
विवाहिता रेखा का कहना है कि शादी के बाद उसने ससुराल में आकर करवाचौथ से परहेज की बात सुनी तो वह मन मसोस कर रह गई। विवाहिता पूनम का कहना है कि करवाचौथ पर सुहाग सलामती को निर्जला व्रत रखने को मन में बड़ी उमंग थी, लेकिन बंदिश की वजह से इस त्योहार को नहीं मना सकी। जिसकी कसक उसे हमेशा कचोटती रहती है।
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सुरीर गांव में करवाचौथ नहीं मनाने वाली महिला
- फोटो : अमर उजाला
महिला प्रीति का कहना है कि सैकड़ों वर्षों से चली आ रही इस परंपरा का पीढ़ी दर पीढ़ी निर्वहन कर रहे हैं। इस बंदिश को तोड़ने की किसी में हिम्मत नहीं है।
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karwa chauth
- फोटो : self
बुजर्गो की मानें तो सैकड़ों वर्ष पहले गांव रामनगला (नौहझील) का ब्राह्मण युवक अपनी पत्नी को विदा कराकर घर लौट रहा था। सुरीर में होकर निकलने के दौरान वघा मोहल्ले में ठाकुर समाज के लोगों का ब्राह्मण युवक की बग्घी के भैंसा को लेकर विवाद हो गया। जिसमें इन लोगों के हाथों ब्राह्मण युवक की मौत हो गई थी। अपने सामने पति की मौत से कुपित मृतक ब्राह्मण युवक की पत्नी इन लोगों को श्राप देते हुए सती हो गई थी। इसे सती का श्राप कहें या बिलखती पत्नी के कोप का कहर, संयोगवश इस घटना के बाद मोहल्ले में मानो कहर आ गया। कई जवान लोगों की मौत हो गई, महिलाएं विधवा होने लगीं। शोक, डर और दहशत से इन लोगों के परिवार में कोहराम मचने लगा। जिसे देख कुछ बुजर्ग लोगों ने इसे कहर को सती का श्राप मानते हुए क्षमा याचना की और मोहल्ले में मंदिर बना कर सती की पूजा-अर्चना शुरू कर दी। पति और पुत्रों की दीर्घायु को मनाए जाने वाले करवाचौथ एवं अहोई अष्टमी के त्योहार पर सती बंदिश लगा गई थी। तभी से त्योहार मनाना तो दूर इनकी महिलाएं पूरा साज-श्रृंगार भी नहीं करती हैं। उन्हें ऐसा करने पर सती के नाराज होने का भय बना रहता है।
मथुरा के गांव सुरीर में एक सती का बना मंदिर
- फोटो : अमर उजाला
कस्बा सुरीर में सती की पूजा अब एक देवी की तरह हो रही है। यहां विवाह-शादी एवं तीज त्योहार पर सती की मंदिर में आकर पूजा अर्चना की जाती है।मोहल्ले के ही नहीं बल्कि सुरीर में सभी जाति के लोग सती मंदिर पर मत्था टेकने के लिए आते है। नौहझील के गांव रामनगला के ब्राह्मण लोग आज भी सुरीर में पानी पीने से परहेज रखते हैं। प्रेमचंद्र शर्मा ने बताया कि घटना के बाद से ही सुरीर में खाना तो दूर पानी पीने से भी गांव के लोग परहेज करते हैं। इस परंपरा का पीढ़ी दर पीढ़ी निर्वहन होता चला आ रहा है।
नोटः अमर उजाला कभी भी अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देता है। ये खबर सिर्फ गांव की मान्यताओं पर आधारित हैं।