फैशन का पर्याय बन चुके कपड़ों को पहनते समय आपने सोचा होगा कि इन्हें सिलने वाली सिलाई मशीन का संग्रह भी किसी का शौक होगा। कमलानगर निवासी कुलदीप वर्मा के पास 50 दुर्लभ सिलाई मशीनें उपलब्ध हैं। उनके संग्रह में 150 साल पुरानी सिलाई मशीन भी शामिल है। इनका वजन 4.5 से लेकर 40 किलो तक है।
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मशीनों के साथ कुलदीप वर्मा
- फोटो : अमर उजाला
कुलदीप बताते हैं कि इसमें प्रमुख योगदान उनके पिता ओम प्रकाश वर्मा का रहा। उनकी मेहनत के बदौलत ही अमेरिका, जर्मनी, जापान और इंग्लैंड की बनी सिलाई मशीन जमा हो सकीं। पिता अंग्रेजों के जमाने के सिलाई मशीन कारीगर थे। उनके पास सिंगर, पफ, जूकी, टाइटन, जॉन्स, फ्रिस्टर एंड रोस्मान, व्हीलर एंड विल्सन और जनडप आदि कंपनियों की मशीन हैं।
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दुर्लभ सिलाई मशीन
- फोटो : अमर उजाला
संग्रह में साढे़ चार किलो से 40 किलो तक के वजन की मशीन भी शामिल है। 2015 में पिता की मृत्यु के बाद से कुलदीप संग्रह को बढ़ा रहे हैं। वह हर साल सिलाई मशीन दिवस पर मशीनों की प्रदर्शनी लगाते थे। इस बार कोरोना के कारण वह प्रदर्शनी नहीं लगाएंगे।
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दुर्लभ मशीन
- फोटो : अमर उजाला
राज घराने की मशीन भी उपलब्ध
संग्रह में सिंगर कंपनी की 1865 की दुर्लभ मशीन भी है। इसका शटल नाव की आकृति का है। इसके 20 साल बाद का एक मॉडल भी है, जिसका शटल रॉकेट जैसा दिखता है। इसी दौर की एक मशीन ऐसी भी है, जिसमें अंदरूनी मशीनरी को पारदर्शी बनाया गया है। सिलाई मशीनों की रॉल्स रायर कही जाने वाली और इंग्लैंड के राज घरानों में उपयोग हाने वाली 201 के अपोलो मशीन भी उपलब्ध है।
इसलिए मनाया जाता
सबसे पहले लंदन में 1790 में थामस सेंट ने लकड़ी और पीतल से सिलाई मशीन का एक डिजाइन तैयार किया। 1830 में फ्रांस के एक टेलर थीमोनियर ने लकड़ी की एक और सिलाई मशीन बनाई। मशीन बनने से हाथ वाले कारीगरों के सामने संकट पैदा हो गया। उन्होंने गुस्से में आकर थीमोनियर की मशीन को नष्ट कर दिया। 1832 में अमरीका के वाल्टर हंट ने सिलाई मशीन बनाई। 10 सितंबर 1846 को एलियास होव ने सफल व्यावहारिक सिलाई मशीन बना कर पेटेंट करावाया। इस वजह से प्रत्येक वर्ष सितंबर को सिलाई मशीन दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। वर्तमान में 2000 से भी ज्यादा तरह की सिलाई मशीन अनेक कार्यों के लिए प्रयोग की जा रही हैं।