गणेश चतुर्थी पर घरों और पूजा पंडालों में विधि-विधान से भगवान गणेश की स्थापना की जाएगी। गणपति स्थापना के लिए सुबह 11:14 से दोपहर 1:29 बजे तक 2 घंटे 15 मिनट का शुभ मुहूर्त रहेगा।
भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि पर सोमवार को भगवान गणेश का जन्मोत्सव मनाया जाएगा। श्रद्धालु ढोल-नगाड़ों की थाप पर बप्पा को अपने घर और पूजा पंडालों में पूरे विधि-विधान से प्रतिष्ठित करेंगे।
ज्योतिषाचार्य डॉ. पूनम वार्ष्णेय के अनुसार चतुर्थी का आरंभ 14 सितंबर को सुबह 7:07 बजे से होगा। गणपति स्थापना के लिए दिन में 11:14 बजे से दोपहर 1:29 बजे तक का समय अति शुभ रहेगा। ज्योतिषाचार्य डॉ. अरविंद मिश्रा ने बताया कि इस दिन बुधादित्य, मुद्गर, ब्रह्म, इंद्र, कलात्मक और गजकेसरी योग का दुर्लभ संयोग बन रहा है।
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गणेश की प्रतिमा
स्थापना व पूजन विधि
घर के ईशान कोण में लकड़ी की चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाएं। अक्षत से अष्टदल बनाकर भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करें। उनके समक्ष जल से भरा कलश रखें, जिसमें आम के पत्ते, सुपारी, सिक्का डालकर ऊपर नारियल रखें। गंगाजल छिड़ककर स्थान पवित्र करें। इसके बाद केसर, चंदन, हल्दी, अक्षत से तिलक कर लाल-पीले वस्त्र, पुष्पमाला, जनेऊ व आभूषण धारण कराएं। साथ ही बप्पा को मोदक, लड्डू, फल, मेवे और हरा नारियल अर्पित करें। पूजा के दौरान ओम गं गणपतये नमः, श्री गणेश अथर्वशीर्ष, गणेश चालीसा और 108 नामों का पाठ करना विशेष फलदायी माना गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार गणेश चतुर्थी के दिन चंद्रमा का दर्शन नहीं करना चाहिए।
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गणेश उत्सव
- फोटो : अमर उजाला
कैसे होनी चाहिए भगवान गणेश की प्रतिमा
सार्वजनिक जगहों पर जैसे पंडालों में गणेश स्थापना के लिए भगवान गणपति की मूर्ति मिट्टी से बनी हुई होनी चाहिए।
घर और अपने व्यावसायिक प्रतिष्ठानों पर भगवान गणेश की मूर्ति मिट्टी के अलावा सोने, चांदी, स्फटिक और अन्य चीजों से बनी मूर्ति रख सकते हैं।
भगवान गणेश की प्रतिमा जब भी स्थापित करें तो इस बात का ध्यान रखें कि उनकी मूर्ति खंडित अवस्था में नहीं होनी चाहिए।
गणेशजी की मूर्ति में उनके हाथों में अंकुश,पाश, लड्डू, सूंड धुमावदार और हाथ वरदान देने की मुद्रा में होनी चाहिए। इसके अलावा उनके शरीर पर जनेऊ और उनका वाहन चूहा जरूर होना चाहिए।
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भगवान गणेश ।
- फोटो : अमर उजाला।
अखंड सौभाग्य के लिए महिलाओं का निर्जला व्रत
गणेश चतुर्थी के साथ ही हरतालिका तीज का पर्व भी सोमवार को मनाया जा रहा है। सुहागिन महिलाएं पति की दीर्घायु और अखंड सौभाग्य के लिए निर्जला व्रत रखती हैं, वहीं अविवाहित कन्याएं योग्य वर की प्राप्ति के लिए यह पूजन करती हैं। महिलाएं बालू या मिट्टी से भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा बनाकर षोडशोपचार पूजन करती हैं। माता पार्वती को सुहाग की सामग्री और शिवजी को बेलपत्र, भांग व धतूरा अर्पित किया जाता है। पूरे दिन व्रत रखकर कथा सुनने के बाद अगले दिन व्रत का पारण किया जाता है।