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महारास: यहां 150 'गोपियां' आंखें बंदकर रोज करती हैं नृत्य, निभा रहीं पांच हजार वर्ष पुरानी परंपरा

Tue, 25 Aug 2020 03:24 PM IST
मुकेश कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मथुरा
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गहवर वन में नृत्य करतीं किशोरियों - फोटो : अमर उजाला
मथुरा जिले में राधारानी के गांव बरसाना में अनेक स्थानों पर प्रिया-प्रीतम (राधा-कृष्ण) ने रास रचाया था। इनमें से गहवर वन आज भी पांच हजार साल पुरानी महारास लीला का साक्षी है। यहां विरक्त संत रमेश बाबा पिछले 32 वर्ष से नियमित इस महारास परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। गहवर वन में 150 किशोरियां कृष्णकालीन लीला को जीवंत किए हुए हैं। 
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राधाकृष्ण की आरती उतारते सेवायत (फाइल) - फोटो : अमर उजाला
यूं तो भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रज क्षेत्र में अनेक जगहों पर गोपियों के साथ महारास किया था। अब गहवर वन ही एकमात्र ऐसा स्थान है, जहां करीब 150 किशोरियां प्रतिदिन शाम 6 से 7 बजे तक गोपिकाओं की वेशभूषा में आंखें बंद कर श्रीकृष्ण को याद करते हुए नृत्य करती हैं। ब्रज की बाकी लीलाओं की जगहों पर साल में द्वापर युग की तिथि के अनुसार ही महारास लीला का आयोजन होता है।
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बरसाना स्थित राधारानी मंदिर - फोटो : अमर उजाला
32 स्थानों पर मंडल करते थे रास : रमेश बाबा
विरक्त संत रमेश बाबा ने बताया कि रास का विस्तृत रूप महारास है। ब्रज में 32 जगहों पर महारास का वर्णन है। इनमें गहवर वन, बरसाना, सांखर खोरी, विलास गढ़, मान गढ़, दान गढ़, करेहला, मडोई, संकेत वन, रावण वन, पाडर वन, रास वन, कदंब खंडी आदि स्थान प्रमुख हैं। यहां पहले रास मंडलों द्वारा रास के जरिए भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का मंचन किया जाता था। जब श्रीकृष्ण बहुत सारी गोपियों के साथ नृत्य करते हैं तो वह महारास कहलाने लगा।

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गहवर वन में नृत्य करतीं किशोरियों - फोटो : अमर उजाला
गहवर वन महारास में सभी प्रांतों की किशोरियां करती हैं महारास
गहवर वन महारास में अलग-अलग प्रांतों की किशोरियां अपने आराध्य श्रीकृष्ण के लिए एक माला के मोती की भांति कृष्ण मय हो जाती हैं। गोपियों की भांति नृत्य करती हैं। 32 वर्षों से महारास की परंपरा रोज जीवंत होती है।  
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ब्रह्मांचल पर्वत पर स्थित श्रीराधारानी मंदिर
गहवर वन के मान मंदिर से 84 कोस की परिक्रमा और देश भर में धर्म जागरण के लिए प्रचार-प्रसार से प्रभावित होकर और महारास से प्रेरित होकर किशोरियां मान मंदिर से जुड़ रही हैं। यहां किशोरियों के लिए आवास की अलग व्यवस्था है, जिसका प्रबंधन और नियंत्रण किशोरियों के हाथों में ही है।
 
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