मेरी आंखों का तारा ही मुझे आंखें दिखाता है, जिसे हर खुशी दे दी, वो हर गम से मिलाता है। जुबां से कुछ कहूं, कैसे कहूं, किससे कहूं मां हूं, सिखाया बोलना जिसको, वो चुप रहना सिखाता है। कवि दिनेश रघुवंशी की इस कविता में आगरा के रामलाल वृद्धाश्रम में रहने वाले बुजुर्गों का दर्द छलकता है। पितृ पक्ष में पुरखों का श्राद्ध करना था, तो इन बुजुर्गों की याद भी अपनों को आई। कोई मां को घर ले गया तो कोई पिता को। वृद्धाश्रम के अध्यक्ष शिव प्रसाद शर्मा ने बताया कि अपने घर जाने से बुजुर्गों की आंखों में चमक दिखी लेकिन श्राद्ध बीतने के बाद अपने फिर अकेला रहने को वृद्धाश्रम में छोड़ गए। उनकी आंखों में चमक की जगह अब आंसू हैं।
पितृ पक्ष में आई अपनों की याद
कुछ लोगों को पितृ पक्ष में अपनों की याद आ गई। मुन्नी देवी, हरीशंकर, नीलम गुप्ता, शारदा देवी को उनके घरवाले ले गए। आश्रम के अध्यक्ष ने बताया कि घरवालों को देखकर इन बुजुर्गों के जैसे सारे दुखों को अंत हो जाता है। ये अपने साथ किए गए व्यवहार को भी भूल जाते हैं।