जोंस मिल में सरकारी जमीन पर कब्जा करने वाले लोगों के खिलाफ मुकदमे दर्ज कराए जाएं, इनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए। जमीन बेचने वाले ही नहीं, खरीदने वाले भी दोषी हैं...। ये निर्देश सोमवार को डीएम प्रभु एन सिंह ने एडीएम प्रशासन, एसडीएम सदर और तहसीलदार को दिए हैं। उन्होंने कहा कि मुकदमा दर्ज होने के बाद आरोपियों को भूमाफिया घोषित कराया जाए।
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जोन्स मिल
- फोटो : अमर उजाला
डीएम ने कहा कि जमीन खरीदने वालों के विरुद्ध कार्रवाई बाद में तय होगी। पहले विक्रेताओं और जमीनें खुदबुर्द करने वालों के खिलाफ प्रशासन कार्रवाई करेगा। इस संबंध में अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश जारी कर दिए हैं। डीएम ने बताया कि हाईकोर्ट में दायर जनहित याचिका के कारण उत्पीड़नात्मक कार्रवाई 15 जनवरी तक स्थगित हैं। 15 जनवरी के बाद जोंस मिल प्रकरण में कार्रवाई की समीक्षा होगी।
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जोंस मिल की जगह
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12 लोगों ने रखा कमेटी में पक्ष
जोंस मिल की जमीन से संबंधित व्यक्तियों की सुनवाई के लिए एडीएम प्रोटोकॉल की अध्यक्षता में गठित कमेटी में सोमवार तक 12 लोगों ने अपने प्रत्यावेदन प्रस्तुत किए हैं। इनमें दो लोगों ने शपथपत्र प्रस्तुत नहीं किए। 15 जनवरी शाम पांच बजे तक कमेटी को प्राप्त आवेदनों पर सुनवाई होगी। इनकी रिपोर्ट भी डीएम को भेजी जाएगी।
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जोंस मिल में सरकारी जमीन
- फोटो : अमर उजाला
‘सरकारी भूमि पर लगाई जाए डॉ. आंबेडकर की 522 फुट ऊंची प्रतिमा’
समान अधिकार पार्टी के अध्यक्ष कुलदीप शर्मा ने कहा है कि जोंस मिल भूमि घोटाले की जांच में सामने आया है 74 हेक्टेयर सरकारी जमीन कब्जाई गई है। उन्होंने मांग की है कि जमीन पर डॉ. भीमराव आंबेडकर का स्मारक बनाकर 522 फुट ऊंची मूर्ति लगवाई जाए। यहां अनुसूचित जाति के लोगों के आवास, डॉ. आंबेडकर स्मारक व संग्रहालय बनाने की मांग की। इसके लिए मुख्यमंत्री को पत्र लिखेंगे। आरोप लगाया कि कुछ लोग आगरा के ईमानदार प्रशासनिक अधिकारियों को हटवाकर जोंस मिल प्रकरण को दबाना चाहते हैं। शहर अध्यक्ष लक्ष्मीस्वरूप मित्तल, भूरा उस्मानी, गिरजाशंकर शर्मा, सलीम उस्मानी आदि मौजूद रहे।
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जोंस मिल के इस हिस्से में हुआ था ब्लास्ट
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कांग्रेसियों ने कहा, वर्षों से काबिज लोगों को न हटाया जाए
कांग्रेस का प्रतिनिधिमंडल ने शहर अध्यक्ष देवेंद्र कुमार चिल्लू के नेतृत्व में अपर जिलाधिकारी डॉ. प्रभाकांत द्विवेदी और एडीएम प्रोटोकॉल पीआर सिंह से जोंस मिल और पंचकुइयां में बरसों से काबिज लोगों को बेदखल नहीं किए जाने की मांग की। इसी तरह का मामला पंचकुइयां का है। प्रशासन को कब्जेदारों के दस्तावेजों की जांच परख के बाद ही कोई कदम उठाना चाहिए। इस मौके पर अशोक शर्मा, हबीब कुरैशी, आशीष तिवारी, आईडी श्रीवास्तव, अदनान कुरैशी, सत्येंद्र कैम, याकूब शेख आदि रहे।
‘अदालतें फैसला दे चुकी हैं, उन्हें देखे प्रशासन’
जोंस मिल की जमीन के हिस्सेदारों में से एक विनय कुमार पाटनी का कहना है कि इस प्रकरण में बांबे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट फैसला दे चुके हैं, प्रशासन को इन निर्णयों को देखना चाहिए। उन्होंने बताया कि मेजर एयू जॉन ने अपनी वसीयत 20 मार्च 1939 को की थी। बांबे हाईकोर्ट ने विलफेई. फरेरा को वसीयत के संबंध में प्रशासक नियुक्त किया था। उन्होंने संपत्तियां हीरालाल पाटनी, मुन्नी लाल मेहरा को बेच दीं। उन्होंने बताया कि 1964 में आगरा कोर्ट ने मुन्नी लाल मेहरा, हीरालाल पाटनी और गंभीरमल पांडया का अलग-अलग कुर्रा बनाया था। कोर्ट के आदेश पर ही संपत्तियों का रिसीवर नियुक्त हुआ था। उसने ही कब्जा दिलाया। 1974 में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से रिसीवर को हटाया गया था। कई अदालतों में मामले चले जिनमें गंभीर मल पांडया, मुन्नी लाल मेहरा और हीरालाल पाटनी का स्वामित्व व कब्जा माना गया। विनय कुमार का कहना है कि इसके बावजूद प्रशासन हमें बदनाम कर रहा है। हम लोग प्रशासन के सामने अपना पक्ष रख चुके हैं।