सांप्रदायिक हिंसा के बाद चल रहे सर्च आपरेशन में पुलिस को बलवाइयों के घर से पिस्तौल, तमंचे, देसी बम मिल रहे हैं। आपरेशन और चलेगा, तो और बरामदगी होगी। कासगंज के लिए यह नई बात नहीं है।
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कासगंज
- फोटो : अमर उजाला
यहां तमंचे पिस्तौल खिलौनों की तरह आसानी से मिल जाते हैं। मुश्किल तो रोजी रोटी ढूंढना है। न कोई मील है, न कारखाना। रोजगार के लिए नौजवान बाहर जाते हैं। ढंग के अस्पताल तक नहीं है शहर में।
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मौके पर पुलिस
- फोटो : अमर उजाला
पुलिस जब पकड़ना चाहती है, तभी असलाह मिल जाते हैं। पिछले चुनाव में तीन कारखाने पकड़े गए थे अवैध असलाह के। विधान सभा चुनाव से पहले कई खेप मिली थीं। अब हिंसा के बाद तलाशी हो रही है तो असलाह मिल रहे हैं। मथुरा, आगरा के लिए भी यहां से असलाहों की खेप जाती है।
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मौके पर पहुंची पुलिस
- फोटो : अमर उजाला
हथियारों के कई सौदागर हैं जिले में। पुलिस कभी कभी इन पर ध्यान देती है। दूसरी ओर सरकार इस जिले को कुछ खास दे नहीं पाई है। कई विभागों के दफ्तर तक नहीं खुले हैं। 2008 में यह एटा से काटकर कासगंज को नया जिला बनाया गया था। दस सालों में एक भी बड़ी फैक्ट्री नहीं लगी है।
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बच्चे स्कूल गए
- फोटो : अमर उजाला
औद्योगिक क्षेत्र विकसित किए जाने की बात थी। बोर्ड लगे लेकिन उद्योग नहीं। सोरो गेट मार्केट के कारोबारी राजकुमार कहते हैं कि यहां न मेडिकल कॉलेज है, न इंजीनियरिंग कॉलेज। डिग्री कॉलेजों में गिनती के कोर्स हैं। जिले में कारखाने नहीं खुल रहे।
रोजगार के लिए नौजवान दिल्ली जाते है। नोएडा में नौकरी ढूंढते हैं। बिलराम गेट के जयराम कहते हैं, जिला घोषित किए जाने के वक्त तो बड़ी घोषणाएं की गई लेकिन सब कोरी रहीं। सोरो में गंगा है, हजारों श्रद्धालू आते हैं, इसे तीर्थस्थल का दर्जा तक नहीं दिया है सरकार ने।