आज हम आपको उन गायिकाओं से परिचित कराते है जिन्होंने विपरीत हालात में रहकर सुर साधना की। संगीत के प्रति अनन्य प्रेम था लेकिन हारमोनियम खरीदने तक के लिए पैसे नहीं थे। स्वर लहरियों पर कभी परिवार ने बंदिश लगानी चाही तो कभी रिश्तेदारों ने। आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण पिता ने भी संगीत सीखाने से मना कर दिया। कुछ ऐसे ही चुनौतियों का सामना करते हुए जीवन की बिगड़ी 'लय' को अपराजिताओं ने सुर-साधना से संभाला और मुकाम हासिल किया।
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हेमा शर्मा
- फोटो : अमर उजाला
शिक्षकों की मदद से खरीदा हारमोनियम, हेमा शर्मा - शाहगंज
मैं 16 साल की थी तब पिता की मौत हो गई। तीन छोटे भाई-बहनों की जिम्मेदारी मेरे पर आ गई। ट्यूशन पढ़ाकर अपनी पढ़ाई पूरी की। आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण खुद ही रियाज करके सिखा। एमए कर रही थी तब फीस भरने और हारमोनियम खरीदने के लिए पैसे नहीं थे। शिक्षकों ने मेरी मदद की। वर्ष 2005 के बाद लोग मुझे हुनर के लिए पहचानने लगे। शादी के बाद इवेंट करने शुरू किए। गोवा, हरिद्वार सहित कई शहरों में प्रस्तुतियां दीं। इलाहाबाद से संगीत प्रभाकर की डिग्री ली। इंडो थाई पेज पर काम किया, जिससे कनाडा, बैंकाक में भी प्रशंसक बढ़े।
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शोभी माथुर
- फोटो : अमर उजाला
ताने सहे पर गायन जारी रखा, शोभी माथुर, पुष्पांजलि बाग
मैं कायस्थ माथुर परिवार से हूं, जहां संगीत की पूजा होती है। शास्त्रीय संगीत गुरु आचार्य लक्ष्मण नारायण और भाव संगीत आचार्य टीएन शर्मा से सिखा। जब मैं 11वीं कक्षा में थी तभी शास्त्रीय गायन में प्रवीण कर लिया था। ऑल इंडिया में मेरी तीसरी रैंक थी। रेडियो पर गाती थी। दूरदर्शन पर गजलें गाईं। कई बड़े कलाकारों के साथ काम करने का मौका मिला। आगरा कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर रही। आसपास के लोग ताने देते थे कि जब टीचर बन गई हो तो गाने-बजाने की जरूरत क्या है। लेकिन काम जारी रखा। दो फिल्म ब्रज सुंदरी, नहर के किनारे में आवाज दे चुकी हूं।
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मंजरी शुक्ला
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परिवार के लोग कहते थे कि शिक्षक बनो, मंजरी शुक्ला, फतेहाबाद रोड
संगीत की शिक्षा पिता शारदा प्रसाद से ली। म्यूजिक में पीएचडी की। बीए में स्टेज पर गायन की प्रस्तुति देना शुरू किया। शादी के बाद पति के साथ गायन को करियर बना लिया। 2002 से काम कर रही हूं। अमिता त्रिपाठी गुरु रहीं। शादी के बाद परिवार के कुछ लोगों ने का कहना था कि संगीत की बजाए अध्यापन में करियर बनाओ। महिला अगर अकेले संगीत क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहते तो कई तरह की समस्याएं आती हैं। पति ने उन्हें समझाया। इसके बाद मैंने ‘द मेलोडियस ईवन एकेडमी’ शुरू की। टी सीरिज के लिए भी रिकॉर्ड किया।
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शीतल चौहान
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पैसों की कमी के चलते नहीं ले सकी शिक्षा, शीतल चौहान, फाउंड्री नगर
संगीत सुनने और गाने का शौक शुरू से था। परिवार ने मेरा उत्साहवर्धन किया गया। आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण बचपन में संगीत की शिक्षा नहीं ले सकी। पिता ने पैसों की तंगी के कारण संगीत सिखाने से मना कर दिया। होली मिलन समारोह में प्रस्तुति दे रही थी तब नागेंद्र कुमार सैनी ने मुझे देखा। संगीत सीखने में उन्होंने काफी मदद की। इसके बाद गजल गायक सुधीर नारायण और रवि भटनागर के सहयोग से संगीत की शिक्षा मिली। ‘वायस ऑफ आगरा’ का खिताब अपने नाम किया। शादी के बाद नौकरी और परिवार को संभालते हुए संगीत साधना जारी रखी। लखनऊ क्लासिकल वायर ऑफ में द्वितीय स्थान प्राप्त किया।
डर की वजह से हो जाता था गला खराब, कृतिका नारायन, सदर
छह साल की उम्र से स्टेज पर प्रस्तुतियां देना शुरू कर दिया था। बचपन में अक्सर प्रतियोगिता से पहले मेरा गला खराब हो जाता था। तब पिता ने समझाया कि डर की वजह से ऐसा होता है। उस बात को मन में बैठा लिया और अभ्यास करना जारी रखा। आज मुंबई में काम कर रही हूं। संगीत मेरा प्रेम है। साथ में जॉब भी करती हूं। दोनों के बीच सामंजस्य बैठाना मुश्किल होता है। ऑफिस में घंटों मेहनत करने के बाद जब घर आती हूं तो भी संगीत साधना जरूर करती हूं। इन दिनों वर्चुअल शो कर रही हूं।