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किन्नरों की ये अदाएं देखकर बढ़ जाएंगी आपकी दिल की धड़कनें, रैंप पर कुछ यूं चला उनका जादू

Sat, 17 Mar 2018 10:21 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला आगरा
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मॉडल के साथ किया कैटवॉक - फोटो : अमर उजाला
उत्साह था। उमंग और उल्लास भी। किन्नरों के प्रति समाज की बदलती सोच से किन्नर काफी खुश थे। मॉडल्स के साथ कैटवॉक करते किन्नरों का आत्मविश्वास देखने लायक था। अवसर था रिवाज संस्थान की ओर से आयोजित किए गए कार्यक्रम  ‘एक शाम-मानवता के नाम।’
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क्या अदा है - फोटो : अमर उजाला
कार्यक्रम का शुभारंभ देश की पहली किन्नर लोक अदालत जज ज्योता मंडेल और विद्या राजपूत ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया। इस अवसर पर थर्ड जेंडर वेलफेयर बोर्ड की सदस्य विद्या राजपूत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद समाज में किन्नरों का कद बढ़ा है। कई साल पहले घर-घर जाकर बधाई देने वाले किन्नरों के प्रति समाज का रवैया काफी सकारात्मक हुआ है। 
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किन्नर - फोटो : अमर उजाला
उन्होंने कहा कि भारत दुनिया का सातवां देश है, जिसमें किन्नरों को समाज की मुख्यधारा में शामिल किया गया है। उन्होंने सरकार से आह्वान किया कि जिस तरह से बेटी बचाओ के प्रति सरकार जागरूक  है, उसी तरह किन्नर बचाओ के लिए भी सरकार को कुछ योजना लानी चाहिए। कार्यक्रम में मॉडल्स के साथ किन्नरों ने कैटवॉक किया। 

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क्या अदा है - फोटो : अमर उजाला
किन्नरों के कैटवॉक में गजब का आत्मविश्वास दिखाई दिया। कुछ विदेशी मेहमानों ने भी किन्नरों के साथ कैटवॉक किया। झुग्गी-झोपड़ी से आए बच्चों ने भी कैटवॉक किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. कविता रायजादा ने किया। इस अवसर पर रिवाज संस्था की संस्थापिका मधु सक्सेना और अंशिका सक्सेना ने सभी को धन्यवाद दिया। 
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विदेशी पर्यटकों के साथ किन्नर - फोटो : अमर उजाला
हम भी जीना चाहते हैं। खुलकर जिंदगी जीने का मन करता है। सच बोलूं, तो अब यह सोचकर अच्छा लगता है कि समाज हमें धीरे-धीरे स्वीकार करने लगा है। किन्नर चांदनी अमर उजाला से बातचीत करते हुए काफी भावुक हो गईं। उनका कहना था कि समाज में पहले जो दिक्कतें आती थीं, उनमें काफी हद तक सुधार आया है। कभी-कभी मां-बाप के बिछड़ने का अफसोस होता है, लेकिन किन्नर समाज ही हमारा भाई-बहन है। 
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विदेशी पयर्टकों ने तस्वीर की कैद - फोटो : अमर उजाला
रिवाज संस्थान की कोशिशों ने किन्नरों के उद्धार की दिशा में सराहनीय पहल की। संस्था की इस प्रशंसनीय पहल को शहर का साथ नहीं मिल सका। सूरसदन में खाली पड़ी कुर्सियां इस सच्चाई की गवाह बनीं। लगभग तीन घंटे तक चलने वाले कार्यक्रम के दौरान पूरे सूरसदन में चंद लोग ही दिखाई दिए।  
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