भारतीय महिला हॉकी टीम ने बर्मिंघम राष्ट्रमंडल खेलों में ऐतिहासिक कांस्य पदक जीता है। टीम ने कांस्य पदक के मैच में न्यूजीलैंड को पेनल्टी शूटआउट में 2-1 से हरा दिया। इसमें सबसे ज्यादा योगदान कप्तान और गोलकीपर सविता पूनिया का रहा।
कहते हैं कि पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पहचानने वाले की नजर पारखी होनी चाहिए। भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तान गोलकीपर सविता पूनिया आज किसी पहचान की मोहताज नहीं है। प्राइमरी शिक्षा के दौरान शिक्षक ने छठी कक्षा में ही सविता पूनिया की प्रतिभा को पहचान लिया था। केवल इस हीरे को तराशने की जरूरत थी। हुआ भी ऐसा ही। मेहनत करवाई तो इसका सकारात्मक परिणाम आज सभी के सामने है।
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भारतीय महिला टीम ने जीता कांस्य
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न्यूजीलैंड के खिलाफ कांस्य पदक मैच में सविता द्वारा सेव करने के बाद बाकी खिलाड़ी उनपर कूद पड़ीं
- फोटो : सोशल मीडिया
भारतीय महिला हॉकी टीम ने बर्मिंघम राष्ट्रमंडल खेलों में ऐतिहासिक कांस्य पदक जीता है। टीम ने कांस्य पदक के मैच में न्यूजीलैंड को पेनल्टी शूटआउट में 2-1 से हरा दिया। इसमें सबसे ज्यादा योगदान गोलकीपर सविता पूनिया का रहा। सविता ने शूटआउट में चार गोल नहीं होने दिए। कांस्य जीतने के बाद सविता की आंखों में आंसू थे। भारतीय महिला हॉकी टीम स्वर्ण की दावेदार थी, लेकिन ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ सेमीफाइनल में शूटआउट के दौरान हुई बेईमानी ने भारत को हारने पर मजबूर कर दिया।
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पेरिस ओलंपिक है नजर में
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सविता पूनिया ने राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय टीम को लीड किया
- फोटो : सोशल मीडिया
हालांकि, कप्तान सविता ने यह तय किया कि भारतीय टीम का मनोबल न टूटे। पिछले कुछ सालों में भारतीय महिला हॉकी टीम के प्रदर्शन में निखार आया है और इसमें सविता का बहुत बड़ा योगदान रहा है। टोक्यो ओलंपिक में भी कई मैचों में उन्होंने भारत की नैया पार लगाई थी। टोक्यो ओलंपिक में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ क्वार्टर फाइनल मैच को कौन भूल सकता है, जब सविता गोल के सामने दीवार बनकर खड़ी हो गई थीं और कोई गोल नहीं करने दिया था।
'टोक्यो ओलंपिक की सविता पूनिया की ये तस्वीर कौन भूल सकता है
ओलंपिक में हार के बाद रोने लगी थीं
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सविता पूनिया ओलंपिक कांस्य पदक मैच में हार के बाद रोते हुए
- फोटो : सोशल मीडिया
भारत ने तब ऑस्ट्रेलिया को हराया था और पहली बार ओलंपिक के सेमीफाइनल में पहुंची थी। ओलंपिक के कांस्य पदक मैच में इंग्लैंड के खिलाफ हार के बाद सविता की रोती हुई तस्वीरों ने हर भारतीय को भावुक कर दिया था। इससे पता चलता है कि सविता के लिए देश सर्वोपरि है और देश के लिए पदक जीतना उनके लिए कितना मायने रखता है।
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हरियाणा के सिरसा के रहने वाली हैं सविता
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परिवार के साथ सविता पूनिया।
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
हरियाण के सिरसा जिले के गांव जोधकां की मूल निवासी सविता पूनिया को वर्ष 2018 में अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित किया जा चुका है। इतना ही नहीं, उन्हें भीम अवॉर्ड के लिए भी चुना गया था। सविता मौजूदा समय में महिला हॉकी में देश की सबसे बड़ी खिलाड़ी हैं। राष्ट्रमंडल खेलों में पदक जीतने के बाद सविता की नजर 2024 में होने वाले पेरिस ओलंपिक में पदक जीतने पर है।
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शिक्षक ने पहचाना तो पिता को किया सूचित, बोले- यह लड़की आगे तक जाएगी
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सविता पूनिया
- फोटो : सोशल मीडिया
सविता पूनिया गांव जोधकां के प्राइमरी स्कूल की ही छात्रा थीं। वर्ष 2003 में छठी कक्षा में पढ़ने वाली छात्रा सविता को खेलते हुए देखा तो उनके खेल शिक्षक दीपचंद कंबोज ने पहचान लिया कि अच्छा खेलती है। उन्होंने सविता के पिता महेंद्र पूनिया, जो स्वास्थ्य विभाग में फार्मासिस्ट है उनसे चर्चा की। इस दौरान कहा कि अगर सविता को मौका दिया जाए तो यह आगे तक जा सकती है।
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पिता ने दिया बेटी का साथ
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महिला हॉकी टीम की कप्तान सविता पूनिया।
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
पिता ने तुरंत प्रभाव से इस पर मेहनत शुरू कर दी। महेंद्र पूनिया बताते हैं कि उस समय वेतन कुछ ज्यादा नहीं था, सुविधाओं का भी अभाव था। लेकिन इसके बावजूद सविता को मेहनत करवाई। संघर्ष के पहले ही साल में सविता ने जूनियर वर्ग नेशनल लेवल की हॉकी प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल जीता था। इसके बाद सविता ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
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सविता पूनिया
- फोटो : सोशल मीडिया
गांव में सुविधाओं का अभाव था तो सविता ने ढाणी में खेतों की मेढ़ पर दौड़कर फिटनेस बनाई। महेंद्र पूनिया बताते हैं कि सविता को आगे ले जाने में उनके कोच सुंदर सिंह खरब का भी महत्वपूर्ण योगदान है।
सविता के पिता महेंद्र पूनिया बताते है कि सविता बचपन से ही शर्मीले स्वभाव की है। घर से दूर रहने की आदत नहीं थी। इसी कारण शुरू में परेशान रही। लेकिन इसके बावजूद वह नियमों की पक्की है। इस कारण अपने आप को संभाला और संघर्ष किया। कई बार ऐसा मौका भी आया जब त्योहार या परिवार के शादी जैसे बड़े कार्यक्रमों में भी सविता शामिल नहीं हो पाई। सविता ने खेल पर ध्यान रखा। उसकी मेहनत का ही परिणाम है कि आज वह काफी उपलब्धियां हासिल कर चुकी है।