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Mahashivratri 2023: भगवान शिव जितने रहस्यमयी हैं उनकी वेशभूषा भी उतनी निराली, जानिए उनसे जुड़े तथ्य

Fri, 17 Feb 2023 08:01 AM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला
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महाशिवरात्रि 2023: फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को पड़ने वाली शिवरात्रि महाशिवरात्रि कहा जाता है। शास्त्रों के अनुसार फाल्गुन माह चतुर्दशी तिथि को ही भगवान शिव और पार्वती का विवाह हुआ था। - फोटो : अमर उजाला
Mahashivratri 2023: महाशिवरात्रि का पावन पर्व यानि भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न करने और अपनी मनोकामनाएं पूर्ण करने का महोत्सव है।शिवजी बड़े सरल हैं,वे थोड़ी सी भक्ति से भी शीघ्र प्रसन्न होने वाले देव हैं। ये मात्र जल,बिल्ब पत्र चढ़ाने और 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र जाप करने से भी भक्तों के मनोरथ पूरे कर देते हैं। भगवान शिव ने प्रत्येक त्याज्य वस्तु को अपनाया और उन्हें पूज्य प्रतीक बनाया। शिव प्रतीकों में जीवन के गूढ़ रहस्य समाए है, आइए जानते हैं।
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mahashivratri 2023 - फोटो : अमर उजाला
चन्द्रमा
शिवजी के जटाजूट पर चंद्रमा है जो प्रतीक है शीतलता का,मन का।मनुष्य का सारा जीवन मन पर ही तो निर्भर करता है,इसलिए मन को संतुलित शिव के माध्यम से ही किया जा सकता है।चंद्र आभा,प्रज्जवल,धवल स्थितियों को प्रकाशित करता है,जो मन के शुभ विचारों के माध्यम से उत्पन्न होते हैं ।ऐसी अवस्था में  प्राणी को अपने यथा योग्य श्रेष्ठ विचारों को पल्ल्वित करते हुए सृष्टि के कल्याण की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए ।
 
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mahashivratri 2023 - फोटो : अमर उजाला
त्रिशूल और डमरू
शिवजी के श्रृंगार में त्रिशूल का विशिष्ट स्थान है।त्रिशूल प्रतीक है भौतिक,दैविक और आध्यात्मिक धाराओं का और साथ ही साथ शक्ति का भी। त्रिशूल के तीन शूल क्रमशः सत,रज और तम गुण से प्रभावित भूत,भविष्य और वर्तमान का द्योतक हैं।त्रिशूल के माध्यम से युग-युगांतर में सृष्टि के विरुद्ध सोचने वाले राक्षसों का संहार किया है।डमरू उस अनहद नाद का घोतक है जिसकी आकांक्षा सभी को रहती है।

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mahashivratri 2023 - फोटो : अमर उजाला
नंदी
शिवजी के नंदी चार पैर वाले होकर धर्म,अर्थ और मोक्ष के प्रतीक होने के साथ-साथ अनंत प्रतीक्षा व धैर्य के संप्रतीक हैं।शिव के गण नंदी भक्ति के उस रूप का दर्शन करवाते हैं जिसमें भक्त अपने आराध्य से मिलने को उतावले हैं लेकिन अपनी सीमाओं में। इसी का प्रमाण है कि ध्यानस्थ शिव को कोई भी सन्देश पहुंचना हो तो नदी सर्वश्रेष्ठ माध्यम है इसलिए शिवजी से पहले नंदी के चरण छुए जाते हैं और उनके कानों में मनोकामना बोली जाती है।    
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MahaShivratri - फोटो : अमर उजाला
शीश पर गंगा और तन पर भस्म
सदाशिव ने अपनी जटाओं में गंगा को स्थान देकर यह संदेश दिया कि आवेग की अवस्था को दृढ़ संकल्प के माध्यम से संतुलित किया जा सकता है। शिव अपने शरीर पर भस्म धारण करते हैं। भस्म से नश्वरता का स्मरण होता है। प्रलयकाल में समस्त जगत का विनाश हो जाता है, केवल भस्म (राख) शेष रहती है। यही दशा शरीर की भी होती है।  
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महाशिवरात्रि 2023 - फोटो : amar ujala
त्रिनेत्र और सर्प
शिवशंकर त्रिनेत्रधारी हैं जो इस बात का प्रतीक है कि दो आखें तो सिर्फ संसार को देखने के लिए हैं,वही तीसरा नेत्र ज्ञान और प्रज्ञा के लिए है अतः अपने कल्याण के लिए मनुष्य को सदैव अपना ज्ञान का नेत्र खुला रखना चाहिए। सर्फार को वरण करना शिव की चैतन्य,सतर्क  अवस्था को दर्शाता है।दूसरी तरफ सर्प तमोगुणी है और संहारक वृत्ति का जीव है।अत: संहारिकता के प्रतीकस्वरूप शिव उसे धारण किए हुए हैं अर्थात शिव ने तमोगुण को अपने वश में कर रखा है।
 
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