आचार्य चाणक्य
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सही मायने में प्रेम क्या होता है प्रेम
प्रेम व्यक्ति हर व्यक्ति एक दूसरे से करता है, बस उसका रिश्तों के अनुसार स्वरुप बदल जाता है। प्रेम ही व्यक्ति को एक दूसरे से बांधकर रखता है। आचार्य चाणक्य कहते हैं कि प्रेम वह सत्य है जो दुसरो को दिया जाता है। स्वंय से जो प्रेम होता है, वह प्रेम नहीं कहलाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि प्रेम में निस्वार्थ भावना का होना आवश्यक होता है। जो व्यक्ति निस्वार्थ भाव से किसी से प्रेम करता है वही सच्चे मायने में प्रेम है। केवल स्वंय से प्रेम करना स्वार्थ होता है।