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Chanakya niti: भोजन, प्रेम, बुद्धिमत्ता और दान के विषय में हर मनुष्य को ये चीजें जानना है बेहद जरूरी

Thu, 01 Jul 2021 02:26 PM IST
Shashi Shashi धर्म डेस्क, अमर उजाला

सार

सही मायनों में क्या होता है प्रेम, बुद्धिमत्ता, ज्ञान, दान, नीतिशास्त्र में बताई गई हैं ये महत्वपूर्ण बातें
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चाणक्य नीति
आचार्य चाणक्य को विभिन्न विषयों की गहरी समझ थी। ये बुद्धिमान होने के साथ ही दूर्दर्शी भी थे। आज भी इनकी गिनती श्रेष्ठ विद्वानों में की जाती है। आचार्य चाणक्य आसाधारण प्रतिभा के धनी होने के साथ एक महान विभूति थे। विभिन्न विषयों का गहन ज्ञान होने के कारण ये कौटिल्य के नाम से भी विख्यात हुए। आचार्य चाणक्य एक योग्य शिक्षक भी थे। इन्होंने विश्वप्रसिद्ध तक्षशिला विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की थी और यहीं पर आचार्य पद पर रहते हुए विद्यार्थियों को शिक्षित भी किया था। इनके द्वारा कई महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचनी की गई जिसमें से नीतिशास्त्र के वचन आज भी मनुष्य के जीवन में उतने ही प्रासंगिक हैं जितने के उस काल में हुआ करते थे। आचार्य चाणक्य ने नीति शास्त्र में जीवन के महत्पूर्ण पहलुओं के विषय में जिक्र किया है। नीतिशास्त्र में सच्चे प्रेम, दान और बुद्धिमत्ता के विषय बताए हैं जिन्हें हर मनुष्य को जानना आवश्यक है तो चलिए जानते हैं कि इस विषय में क्या कहती है चाणक्य नीति।
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आचार्य चाणक्य - फोटो : Social media
सही मायने में भोजन क्या है
आचार्य चाणक्य कहते हैं कि एक सच्चा भोजन वह है जो ब्राह्मण को देने के पश्चात शेष है। सनातन धर्म में ब्राह्मण को बहुत ही पूजनीय माना गया है इसलिए यहां पर कहने का तात्पर्य यह है कि जो व्यक्ति स्वयं की भूख शांत करने से पहले ब्राह्मण को भोजन कराता है और बाद में शेष स्वयं भोजन करता है, वह भोजन अमृत समान है। इसी तरह केवल ब्राह्मण नहीं बल्कि किसी जरुरतमंद को स्वयं से पहले भोजन करवाने के पश्चात जो भोजन बचता है वह प्रसाद के समान होता है क्योंकि जो व्यक्ति स्वयं की भूख के बजाए दूसरों की क्षुदा के बारे में सोचता है ईश्वर भी उससे प्रसन्न होते हैं।
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आचार्य चाणक्य - फोटो : Social media
सही मायने में प्रेम क्या होता है प्रेम
प्रेम व्यक्ति हर व्यक्ति एक दूसरे से करता है, बस उसका रिश्तों के अनुसार स्वरुप बदल जाता है। प्रेम ही व्यक्ति को एक दूसरे से बांधकर रखता है। आचार्य चाणक्य कहते हैं कि प्रेम वह सत्य है जो दुसरो को दिया जाता है। स्वंय से जो प्रेम होता है, वह प्रेम नहीं कहलाता है।  कहने का तात्पर्य यह है कि प्रेम में निस्वार्थ भावना का होना आवश्यक होता है। जो व्यक्ति निस्वार्थ भाव से किसी से प्रेम करता है वही सच्चे मायने में प्रेम है। केवल स्वंय से प्रेम करना स्वार्थ होता है।

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आचार्य चाणक्य - फोटो : Social media
सही मायनों में ये होती है बुद्धिमत्ता
चाहे व्यक्ति कितना भी ज्ञान अर्जित कर लें,चाहे वह कितने वेद-पुराण, विज्ञान की जानकारी रखता हो परंतु जो सही रहा पर नहीं चलता उसे बुद्धिमान नहीं कहा जा सकता है। बुद्धिमत्ता सही मायने मे वह होती है जो मनुष्य को पापकर्म करने से रोकती है।
 
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आचार्य चाणक्य - फोटो : Social media
ये है श्रेष्ठ दान
दान केवल धन, अन्न का नहीं होता है बल्कि दान वह होता है जो बिलकुल निस्वार्थ भाव से किया जाए चाहें वह केवल श्रम सेवा या किसी की मदद करना ही क्यों न हो। आचार्य चाणक्य कहते हैं कि सही मायने में श्रेष्ठ दान वह है जो बिना दिखावे के किया जाता है। व्यक्ति को सदैव गुप्त दान ही करना चाहिए।
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