आदिगुरु शंकराचार्य
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कैसे होता है शंकराचार्य का चयन ?
आदि गुरु शंकराचार्य ने देश के चारों दिशाओं में चार पीठों की स्थापना की और इन सभी चार पीठों में अपने शिष्यों को पीठाधीश्वर नियुक्त कर केदारनाथ चले गए और यहीं 32 वर्ष की आयु में समाधि ले ली। आदिगुरु शंकराचार्य की समाधि के बाद इन चारों मठों से आज तक शंकराचार्य की परंपरा जारी है। इन चारों मठों में शंकराचार्य के चयन के लिए एक लंबी और काफी जटिल प्रक्रिया अपनाई जाती है।
शंकराचार्य बनने के लिए ब्राह्राण कुल में जन्म और संन्यासी होना जरूरी है। एक संन्यासी को शंकराचार्य बनने के लिए गृहस्थ जीवन का त्याग, मुंडन, पिंडदान और रुद्राक्ष को धारण करना बहुत ही अहम हिस्सा है। शंकराचार्य की पदवी पर आसीन होने वाला संन्यासी चारों वेदों और 6 वेदांगों का ज्ञाता होना चाहिए, साथी ही तन-मन से पवित्र होना जरूरी है।
शंकराचार्य की उपाधि को हासिल करने के लिए व्यक्ति को शंकराचार्यों के प्रमुखों, आचार्य महामंडलेश्वरों, प्रतिष्ठित संतों की सभी की सहमति और काशी विद्वत परिषद की सहमित लेनी जरूरी होती है। इसके बाद ही व्यक्ति को शंकराचार्य की पदवी हासिल होती है।
चारों मठों में किसी एक मठ के शंकराचार्य के चयन प्रक्रिया की शुरुआत अन्य मठों के प्रमुखों के साथ होती है। मठों का प्रमुख किसी एक योग्य और विद्वान उम्मीदवार का चयन करते हैं। फिर इस प्रस्ताव को आचार्य महामंडलेश्वरों के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है। आचार्य महामंडलेश्वर उम्मीदवार के वेदों, शास्त्रों के ज्ञान और योग्यता की जांच करते हैं, फिर ये आचार्य महामंडलेश्वर योग्य उम्मीदवाप को प्रतिष्ठित संतों की सभा के समक्ष प्रस्तुत करते हैं।
फिर सभा के सामने उम्मीदवार को एक परीक्षा देनी होती है, जिसमें ज्ञान, दर्शन और आध्यात्मिकता का परीक्षण किया जाता है। यदि उम्मीदवार परीक्षा में सफल होता है तो उसे काशी विद्वत परिषद के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है। काशी विद्वत परिषद शंकराचार्य के उम्मीदवार की योग्यता का आखिरी मूल्यांकन करती है, उस व्यक्ति को शंकराचार्य की उपाधि प्रदान करती है।
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