फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Pitru Paksha 2025: चंद्र ग्रहण की छाया में होगा पितृ पक्ष आरंभ, जानें तर्पण की सही विधि

Fri, 11 Jul 2025 04:27 PM IST
श्वेता सिंह धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

 Pitru Paksha Aur Chandra Grahan: 7 सितंबर 2025, भाद्रपद पूर्णिमा के दिन जहां एक ओर पितृपक्ष की पवित्र शुरुआत होगी, वहीं दूसरी ओर उसी दिन वर्ष का दूसरा चंद्रग्रहण भी लगेगा। यह संयोग इसलिए भी विशेष माना जा रहा है क्योंकि पितृपक्ष वह समय होता है जब माना जाता है कि पूर्वजों की आत्माएं धरती पर आती हैं और इस बार ठीक उसी क्षण चंद्रमा भी ग्रहण की छाया में डूबा रहेगा।
विज्ञापन
1 of 6
pitru paksh aur chandra grahan - फोटो : adobe stock
Pitru Paksha 2025: पितृपक्ष 2025 इस बार एक बेहद दुर्लभ और रहस्यमयी संयोग के साथ शुरू होने जा रहा है। 7 सितंबर 2025, भाद्रपद पूर्णिमा के दिन जहां एक ओर पितृपक्ष की पवित्र शुरुआत होगी, वहीं दूसरी ओर उसी दिन वर्ष का दूसरा चंद्रग्रहण भी लगेगा। यह संयोग इसलिए भी विशेष माना जा रहा है क्योंकि पितृपक्ष वह समय होता है जब माना जाता है कि पूर्वजों की आत्माएं धरती पर आती हैं और इस बार ठीक उसी क्षण चंद्रमा भी ग्रहण की छाया में डूबा रहेगा।
ज्योतिषीय दृष्टिकोण से यह घटना अत्यंत महत्वपूर्ण है, जो न सिर्फ आध्यात्मिक रूप से बल्कि ऊर्जा और भावनात्मक दृष्टि से भी प्रभाव छोड़ सकती है। ऐसे संयोग विरले ही बनते हैं, जो पितरों की कृपा या संकेत के रूप में देखे जा सकते हैं।

Sawan 2025: सावन में कौन से रंग पहनना है शुभ, किनसे करें परहेज? जानें भोलेनाथ का प्रिय रंग

Sawan 2025: सावन के महीने में क्यों पृथ्वी पर आते हैं महादेव और कहां करते हैं एक माह तक वास ?

Sawan 2025: सावन में कढ़ी-दही क्यों नहीं खानी चाहिए? जानिए धार्मिक और वैज्ञानिक कारण

विज्ञापन

2 of 6
पितृ पक्ष  7 सितंबर से 21 सितंबर 2025 तक रहेगा और इस दौरान पूर्णिमा से अमावस्या तक के 15 दिन बेहद खास माने जाते हैं। - फोटो : Amar Ujala
पितृ पक्ष का महत्व   
पितृपक्ष 2025 एक ऐसा पवित्र काल है जिसे हिंदू धर्म में पूर्वजों को समर्पित माना गया है। पितृ पक्ष  7 सितंबर से 21 सितंबर 2025 तक रहेगा, और इस दौरान पूर्णिमा से अमावस्या तक के 15 दिन बेहद खास माने जाते हैं। मान्यता है कि इन्हीं दिनों में पितृलोक के द्वार खुलते हैं और हमारे पूर्वज धरती पर आते हैं ताकि हम उन्हें स्मरण कर सकें और सम्मानपूर्वक तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध जैसे कर्मों द्वारा उन्हें श्रद्धांजलि दे सकें।
ऐसा माना जाता है कि इन धार्मिक कृत्यों से आत्माओं को शांति और संतोष मिलता है, और बदले में वे अपने वंशजों को आशीर्वाद देते हैं। लेकिन अगर इन परंपराओं की अनदेखी की जाए तो इससे जन्म पत्रिका में पितृ दोष उत्पन्न हो सकता है, जिसके परिणामस्वरूप जीवन में पारिवारिक तनाव, अपशकुन, वैवाहिक रुकावटें और बार-बार आने वाली बाधाएं देखने को मिलती हैं। इसलिए पितृपक्ष का समय केवल श्रद्धा का नहीं, बल्कि अपने कर्मों से आत्माओं को मोक्ष देने का अवसर भी होता है।
विज्ञापन

3 of 6
7 सितंबर 2025, जब भाद्रपद पूर्णिमा पर पितृपक्ष आरंभ होगा, ठीक उसी दिन पूर्ण चंद्रग्रहण भी लगेगा। - फोटो : Freepik
7 सितंबर को पूर्ण चंद्रग्रहण और पितृ पक्ष आरम्भ 
इस वर्ष पितृपक्ष की शुरुआत एक अत्यंत दुर्लभ संयोग के साथ हो रही है। 7 सितंबर 2025, जब भाद्रपद पूर्णिमा पर पितृपक्ष आरंभ होगा, ठीक उसी दिन पूर्ण चंद्रग्रहण भी लगेगा। यह ग्रहण रात 9:57 बजे शुरू होकर 8 सितंबर तड़के 1:26 बजे समाप्त होगा, जबकि सूतक काल दोपहर 12:57 बजे से प्रभावी रहेगा। यह खगोलीय घटना भारत सहित एशिया, यूरोप, अमेरिका, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया और अंटार्कटिका में दिखाई देगी।
पौराणिक मान्यता है कि पितृपक्ष के दौरान पूर्वजों की आत्माएं धरती पर आती हैं। ऐसे में जब उनका आगमन चंद्रग्रहण की छाया के बीच होगा, तो यह न केवल आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बन जाता है, बल्कि इसके ऊर्जा स्तर पर गहरे प्रभाव पड़ सकते हैं। ग्रहों की अशुभ चाल और सूतक की अवधि के चलते तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान जैसे कर्मों में भी सावधानी बरतने की आवश्यकता है। यह संयोग संकेत करता है कि यह समय केवल कर्म का नहीं, बल्कि ध्यान, साधना और आत्मचिंतन का भी है।

4 of 6
दोपहर का समय विशेष रूप से पितरों को समर्पित होता है। यही वजह है कि श्राद्ध कर्म, तर्पण और पिंडदान जैसी क्रियाएं दोपहर में ही की जाती हैं। - फोटो : adobe stock
दोपहर में क्यों किया जाता है तर्पण और अर्पण 
  • पितृपक्ष से जुड़ी परंपराओं और समय की महत्ता के पीछे गहरा आध्यात्मिक और शास्त्रीय आधार है। शास्त्रों के अनुसार, सुबह और शाम का समय देवताओं की पूजा के लिए उचित माना गया है, जबकि रात्रि का समय नकारात्मक और आसुरी शक्तियों की सक्रियता से जुड़ा होता है। वहीं, दोपहर का समय विशेष रूप से पितरों को समर्पित होता है। यही वजह है कि श्राद्ध कर्म, तर्पण और पिंडदान जैसी क्रियाएं दोपहर में ही की जाती हैं।
  • यह भी मान्यता है कि पितृलोक, जो चंद्रमा से ऊपर और मृत्युलोक व देवलोक के बीच स्थित है, पितरों के धरती पर आगमन के दौरान दोपहर के समय से विशेष रूप से जुड़ा होता है। यह समय ऐसा माना जाता है जब पितर अपने वंशजों द्वारा किए गए कर्मों को सहज रूप से स्वीकार कर पाते हैं।
  • एक और मान्यता यह है कि पितर सूर्य की किरणों के माध्यम से श्राद्ध का भोज ग्रहण करते हैं। चूंकि सूर्य देवता पूर्व दिशा से उदय होकर दोपहर तक अपने पूर्ण प्रभाव में आ जाते हैं, इसलिए दोपहर के समय पिंडदान और भोज का आयोजन सबसे उपयुक्त माना जाता है। इस समय सूर्य की ऊर्जा के माध्यम से पितर उस श्रद्धा और आहुति को स्वीकार करते हैं, जो उनके निमित्त की गई होती है। यही कारण है कि श्राद्ध का सबसे श्रेष्ठ और फलदायी समय मध्याह्न (दोपहर) को माना जाता है।

तर्पण और अर्पण का श्रेष्ठ समय: दोपहर 12:00 से 1:30 दोपहर
विज्ञापन

5 of 6
जिन पूर्वजों का तर्पण किया जा रहा है, उनका चित्र या स्मृति चिह्न सामने रखें। - फोटो : Amar Ujala
इस विधि से करें तर्पण 
  • सबसे पहले जिस स्थान पर तर्पण करना है, वहाँ गंगाजल या शुद्ध जल का छिड़काव करें ताकि स्थान पवित्र हो जाए।
  • एक दीपक जलाएं और मन में शांति और पवित्रता का भाव रखें।
  • जिन पूर्वजों का तर्पण किया जा रहा है, उनका चित्र या स्मृति चिह्न सामने रखें।
  • पितरों का ध्यान करते हुए श्रद्धापूर्वक उनका आवाहन करें। आप "ॐ नमः पितृभ्यः" या "ॐ पितृ देवताभ्यो नमः" जैसे मंत्रों का जप कर सकते हैं।
  • कुश की एक जोड़ी लेकर उसे जल से भरे लोटे या पात्र में रखें। इससे ऊर्जा शुद्ध होती है और पूर्वजों को जल अर्पण किया जा सकता है।
  • पितरों के नाम लेते हुए उन्हें जल चढ़ाएं। इस जल में दूध, दही, घी, शहद या तिल भी मिला सकते हैं।
  • तर्पण के समय "ॐ तर्पयामि" मंत्र का जाप करते हुए अर्पण करें।
  • आटे, चावल, तिल आदि से पिंड बनाएं और उन्हें कुश पर रखकर जल से सिंचित करें।
  •  पितरों को उनकी पसंद का भोजन श्रद्धा से चढ़ाएं। यह भावनात्मक रूप से उन्हें स्मरण करने का माध्यम है।
  •  हाथ जोड़कर श्रद्धा और कृतज्ञता के साथ उन्हें प्रणाम करें और आशीर्वाद की कामना करें।
  • तर्पण के बाद पशु-पक्षियों या ज़रूरतमंद लोगों को भोजन करवाना अत्यंत पुण्यकारी होता है।
  • तर्पण पूर्ण होने पर अपनी सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मणों, गरीबों या किसी धार्मिक स्थान पर दान करें।
विज्ञापन
विज्ञापन

6 of 6
श्राद्ध तिथियां - फोटो : Amar Ujala
श्राद्ध तिथियां 
  • 7 सितंबर    पूर्णिमा श्राद्ध (ग्रहण संयोग सहित)
  • 8 सितंबर     प्रतिपदा
  • 9 सितंबर     द्वितीया
  • 10 सितंबर     तृतीया व चतुर्थी
  • 11 सितंबर     पंचमी
  • 12 सितंबर     षष्ठी
  • 13 सितंबर     सप्तमी
  • 14 सितंबर     अष्टमी
  • 15 सितंबर     नवमी
  • 16 सितंबर     दशमी
  • 17 सितंबर     एकादशी
  • 18 सितंबर     द्वादशी
  • 19 सितंबर     त्रयोदशी
  • 20 सितंबर     चतुर्दशी
  • 21 सितंबर     सर्व पितृ अमावस्या (महत्वपूर्ण)
  • 22 सितंबर     मातामह श्राद्ध


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। 
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें