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Mahashivratri 2023: जानिए क्यों शिवलिंग पर नहीं किया जाता शंख से जलाभिषेक ?

Tue, 07 Feb 2023 03:58 PM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला
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मासिक शिवरात्रि पूजन विधि: शास्त्रों के अनुसार इस दिन भगवान शिव और देवी पार्वती का विवाह हुआ था। - फोटो : istock
Mahashivratri 2023: महाशिवरात्रि का पर्व इस साल 18 फरवरी 2023 को है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन भगवान शिव और देवी पार्वती का विवाह हुआ था। एक अन्य मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान शिव,ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए थे। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार महाशिवरात्रि पर व्रत, पूजा और जलाभिषेक करने पर जीवन से जुड़ी तमाम तरह की परेशानियां दूर होती हैं और परिवार में सुख-समृद्धि आती है। लेकिन शिवजी की पूजा में कभी भी शंख का प्रयोग नहीं किया जाता है इसके अलावा भोलेनाथ पर केतकी का पुष्प अर्पित करना भी वर्जित माना गया है। आइए जानते है ऐसा क्यों है?
 
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Maha Shivratri 2023: - फोटो : istock
इसलिए नहीं चढ़ता है शंख से जल
शिवपुराण के अनुसार शंखचूड़ नाम का महापराक्रमी दैत्य हुआ। शंखचूड दैत्यराम दंभ का पुत्र था। दैत्यराज दंभ को जब बहुत समय तक कोई संतान उत्पन्न नहीं हुई तब उसने भगवान विष्णु के लिए कठिन तपस्या की। तप से प्रसन्न होकर विष्णु प्रकट हुए। विष्णुजी ने वर मांगने के लिए कहा तब दंभ ने तीनों लोको के लिए अजेय एक महापराक्रमी पुत्र का वर मांगा। श्रीहरि तथास्तु बोलकर अंतध्र्यान हो गए। तब दंभ के यहां एक पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम शंखचूड़ पड़ा। शंखचूड़ ने पुष्कर में ब्रह्माजी के निमित्त घोर तपस्या की और उन्हें प्रसन्न कर लिया। ब्रह्मा ने वर मांगने के लिए कहा तब शंखचूड ने वर मांगा कि वो देवताओं के लिए अजेय हो जाए। ब्रह्माजी ने तथास्तु बोला और उसे श्रीकृष्णकवच दिया। साथ ही ब्रह्मा ने शंखचूड को धर्मध्वज की कन्या तुलसी से विवाह करने की आज्ञा दी। फिर वे अंतध्र्यान हो गए।
 
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महाशिवरात्रि
ब्रह्मा की आज्ञा से तुलसी और शंखचूड का विवाह हो गया। ब्रह्मा और विष्णु के वरदान के मद में चूर दैत्यराज शंखचूड ने तीनों लोकों पर स्वामित्व स्थापित कर लिया। देवताओं ने त्रस्त होकर विष्णु से मदद मांगी परंतु उन्होंने खुद दंभ को ऐसे पुत्र का वरदान दिया था अत: उन्होंने शिव से प्रार्थना की। तब शिव ने देवताओं के दुख दूर करने का निश्चय किया और वे चल दिए। परंतु श्रीकृष्ण कवच और तुलसी के पतिव्रत धर्म की वजह से शिवजी भी उसका वध करने में सफल नहीं हो पा रहे थे तब विष्णु ने ब्राह्मण रूप बनाकर दैत्यराज से उसका श्रीकृष्णकवच दान में ले लिया। इसके बाद शंखचूड़ का रूप धारण कर तुलसी के शील का हरण कर लिया। शिव ने शंखचूड़ को अपने त्रिशूल से भस्म कर दिया और उसकी हड्डियों से शंख का जन्म हुआ। चूंकि शंखचूड़ विष्णु भक्त था अत: लक्ष्मी-विष्णु को शंख का जल अति प्रिय है और सभी देवताओं को शंख से जल चढ़ाने का विधान है। परंतु शिव ने चूंकि उसका वध किया था। अत: शंख का जल शिव को निषेध बताया गया है। इसी वजह से शिवजी को शंख से जल नहीं चढ़ाया जाता है।

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महाशिवरात्रि
केतकी का फूल नहीं चढ़ता शिवजी पर
शिवपुराण के अनुसार केतकी के फूल को भगवान शिव ने अपनी पूजा से स्वंय त्याग दिया है। इसके पीछे एक कारण है। पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार ब्रह्माजी और भगवान विष्णु में विवाद हो गया कि दोनों में कौन अधिक बढ़ा हैं। विवाद का फैसला शिव जी को करना था। भगवान शिव की माया से एक ज्योतिर्लिंग सामने आया। शिव जी ने कहा कि ब्रह्मा और विष्णु में से जो भी इस ज्योतिर्लिंग का आदि या अंत बता देगा, वही बड़ा कहलाएगा। ब्रह्माजी ने ज्योतिर्लिंग के नीचे की ओर जाने का निर्णय लिया और उसका आरंभ खोजने चल पड़े और विष्णु जी अंत की तलाश में ऊपर की ओर चले। काफी देर बाद ब्रह्माजी ने देखा कि एक केतकी फूल भी उनके साथ नीचे आ रहा है।
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सावन शिवरात्रि 2023
ब्रह्माजी ने केतकी के फूल को झूठ बोलने के लिए तैयार किया और भगवान शिव के पास पहुंच गए। इसके बाद ब्रह्माजी ने दावा किया कि उन्हें ज्योतिर्लिंग कहां से उत्पन्न हुआ, यह पता चल गया है। दूसरी ओर विष्णु जी ने कहा कि मैं ज्योतिर्लिंग का अंत नहीं जान पाया हूं। ब्रह्माजी ने अपनी बात को सच साबित करने के लिए केतकी के फूल से झूठी गवाही दिलवाई, लेकिन शिव जी को सच पता था। जहां झूठ बोलने के लिए उन्होंने ब्रह्माजी का एक सिर काट दिया, वहीं केतकी के फूल को अपनी पूजा से वर्जित कर दिया।

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