मां कामाख्या - कामनाओं का शक्तिपीठ
- फोटो : Rohit Jha
यहां पर गिरा था सती का यह अंग
शास्त्रों के अनुसार महाशक्ति ही परम ब्रह्म परमात्मा है। इनके विविध स्वरुप हैं, जो अनेकों रूपों में विभिन्न लीलाएं करती हैं। नवदुर्गा, दसमहाविद्या, अन्नपूर्णा, जगतधात्री, कात्यायनी, ललिताम्बा, गायत्री, भुवनेश्वरी, काली, तारा, बगला तथा दुर्गा आदि इन्हीं के रूप हैं। इन्हीं की शक्ति से ब्रह्मा विश्व की उत्पत्ति करते हैं, इन्हीं की शक्ति से श्री विष्णु सृष्टि का पालन करते हैं और शिव जगत का संहार करते हैं, अर्थात यही सृजन, पालन और संहार करने वाली आद्या परमशक्ति हैं। ये ही पराशक्ति नवदुर्गा, दस महाविद्या हैं। ये ही नर और नारी हैं एवं ये ही माता, धाता तथा पितामह हैं। बल प्राप्ति के लिए महाकाली, विद्या के लिए महासरस्वती तथा धन के लिए महालक्ष्मी की उपासना लोक में प्रसिद्ध हैं।
भारतवर्ष में शक्ति साधना के कुछ विशिष्ट स्थल हैं जो शक्तिपीठ के नाम से जाने जाते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार दक्ष प्रजापति के यज्ञ में भगवान शंकर को आमंत्रित न करने एवं उनका अपमान किए जाने के कारण भगवती सती ने यज्ञ की अग्नि में अपने शरीर का परित्याग करके यज्ञ विध्वंस कर दिया। भूतभावन भगवान सदा शिव क्रोधित होकर सती की देह को अपने कंधे पर रखकर तांडव नृत्य करते हुए पृथ्वी पर भ्रमण करने लगे। उसी समय देवताओं के अनुरोध पर भगवान विष्णु ने सती के विभिन्न अंगों को एक-एक करके अपने सुदर्शन चक्र से खंड-खंड कर दिया। देवी के ये चिन्मय अंग 51 स्थानों पर गिरे जो 51 सिद्ध शक्तिपीठ बन गए।
मां कामाख्या - कामनाओं का शक्तिपीठ
शक्तिपीठ में नहीं है देवी की कोई मूर्ति
तंत्र चूड़ामणि में कहा गया है कि भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से कटकर देवी सती के विभिन्न अंग जहां-जहां गिरे वहां एक-एक शक्ति एवं एक-एक भैरव विराजमान हो गए। भारतवर्ष की पुण्यभूमि में विभिन्न भागों में ये शक्तिपीठ स्थित हैं, जिनके दर्शन, पूजन से विविध मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। ऐसा ही एक शक्तिपीठ है, जो महाशक्तिपीठ कहलाता है — 'कामाख्या देवी का मंदिर'। यह मंदिर असम राज्य के गुवाहाटी में एक पहाड़ी पर बना है।
यह मंदिर अन्य शक्तिपीठों की अपेक्षा थोड़ा भिन्न है क्योंकि यह स्थल तंत्र साधना के लिए भी बहुत प्रसिद्ध है। इस मंदिर में देवी की कोई मूर्ति नहीं है। यहां पर माता सती का योनि भाग गिरा था इसलिए यहां देवी के योनि भाग की ही पूजा की जाती है, जो कि शिला के रूप में विराजमान है। यहां नीलप्रस्तरमय योनि माता कामाख्या साक्षात निवास करती हैं। जो मनुष्य इस शिला का पूजन, दर्शन, स्पर्श करते हैं, वे देवी कृपा तथा मोक्ष के साथ मां भगवती का सानिध्य प्राप्त करते हैं।
इस शक्तिपीठ में देवी माँ 64 योगनियों और दस महाविद्याओं के साथ विराजित है। भुवनेश्वरी, बगला, छिन्न मस्तिका, काली, तारा, मातंगी, कमला, सरस्वती, धूमावती और भैरवी एक ही स्थान पर विराजमान हैं। यूं तो सभी शक्तिपीठों का अपना महत्व है, पर अन्य सभी में कामाख्या शक्तिपीठ को सर्वोत्तम माना जाता है। कलिका पुराण के अनुसार इसी स्थान पर कामदेव शिव के त्रिनेत्र से भस्म हुए तथा अपने पूर्व रूप की प्राप्ति का वरदान पाया था। यहां कामनारुपी फल की प्राप्ति होती है।
मां कामाख्या - कामनाओं का शक्तिपीठ
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इसलिए मनाया जाता है अम्बुबाचि पर्व
अम्बुबाचि शब्द अम्बु और बाचि दो शब्दों से मिलकर बना हुआ है, जिसमें अम्बु का अर्थ है, पानी और बाचि का अर्थ है, उतफूलन। यह शब्द स्त्रियों की शक्ति और उनकी जन्म क्षमता को दर्शाता है। प्रतिवर्ष जून के महीने में यह मेला उस वक्त लगता है, जब मां कामाख्या ऋतुमती रहती हैं। अम्बुबाचि योग पर्व के दौरान माँ भगवती के गर्भ गृह के कपाट स्वतः ही बंद हो जाते हैं और उनके दर्शन भी निषेध हो जाते हैं। तीन दिनों के उपरान्त माँ भगवती की रजस्वला समाप्ति पर उनकी विशेष पूजा एवं साधना की जाती है। चौथे दिन ब्रह्म मुहूर्त में देवी को स्नान करवाकर श्रृंगार के उपरान्त ही मंदिर श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खोला जाता है।
यात्री पहले दिन कामेश्वरी देवी और कामेश्वर शिव के दर्शन करते हैं और तब महामुद्रा के दर्शन करते हैं। देवी का योनिमुद्रापीठ दस सीढ़ी नीचे एक गुफा में स्थित है, जहां हमेशा अखंड दीपक जलता रहता है। यहं आने-जाने का मार्ग अलग बना हुआ है। यहां पर भक्तों को प्रसाद के रूप में एक गीला कपड़ा दिया जाता है, जिसे अम्बुबाचि वस्त्र कहते हैं। कहते हैं कि देवी के रजस्वला होने से पूर्व गर्भगृह में स्थित महामुद्रा के आस-पास सफ़ेद वस्त्र बिछा दिए जाते हैं, तीन दिन बाद जब मंदिर के पट खोले जाते हैं, तब यह वस्त्र माता के रज से रक्तवर्णं हो जाते हैं। बाद में इसी वस्त्र को भक्तों में प्रसाद के रूप में बांटा जाता है। मान्यता है कि इस वस्त्र को धारण करके उपासना करने से भक्त की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। इस समय ब्रह्मपुत्र नदी का पानी तीन दिन के लिए लाल हो जाता है।
कामाख्या में अम्बुबाचि पर्व के अलावा दो उत्सव और मनाए जाते हैं, जिनमें से एक है 'देवध्वनि' जिसे 'देऊधाबी' कहते हैं। इसमें वाद्ययंत्रों के साथ नृत्य किया जाता है। पौष माह के कृष्ण पक्ष में पुष्य नक्षत्र में पुष्याभिषेक उत्सव मनाया जाता है, जिसमें कामेश्वर की चल मूर्ति को कामेश्वर मंदिर में प्रतिष्ठित किया जाता है। दूसरे दिन भगवती के पंचरत्न मंदिर में दोनों मूर्तियों का हर-गौरी विवाह महोत्सव मनाया जाता है। महाकुंभ कहे जाने वाले इस मेले के दौरान तांत्रिक शक्तियों को काफी महत्व दिया जाता है। यहां सैंकड़ों तांत्रिक अपने एकांतवास से बाहर आते हैं और अपनी शक्तियों का प्रदर्शन करते हैं।
मां कामाख्या - कामनाओं का शक्तिपीठ
इसलिए जरूरी है भैरव दर्शन
कामाख्या मंदिर से कुछ दूरी पर उमानंद भैरव का मंदिर है। उमानंद भैरव ही इस शक्तिपीठ के भैरव हैं। यह मंदिर ब्रह्मपुत्र नदी के बीच में टापू पर स्थित है। मान्यता है कि इनके दर्शन के बिना कामाख्या देवी की यात्रा अधूरी मानी जाती है। इस टापू को मध्यांचल पर्वत के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि यहीं पर समाधिस्थ सदा शिव को कामदेव ने कामबाण मारकर आहत किया था और समाधि जाग्रत होने पर शिव ने अपने तीसरे नेत्र से उन्हें भस्म कर दिया था। भगवती के महातीर्थ नीलांचल पर्वत पर ही कामदेव को पुनः जीवनदान मिला था, इसलिए यह क्षेत्र कामरूप के नाम से भी जाना जाता है।
मां कामाख्या - कामनाओं का शक्तिपीठ
कुछ ऐसा है मंदिर का इतिहास
कामाख्या के बारे में पौराणिक कथा है कि अहंकारी असुर नरकासुर एक दिन माँ भगवती कामाख्या को अपनी पत्नी के रूप में पाने का दुराग्रह कर बैठा था। कामाख्या महामाया ने नरकासुर की मृत्यु को निकट मानकर उससे कहा कि यदि तुम इसी रात में नील पर्वत पर चारों तरफ पत्थरों के चार सोपान पथों का निर्माण कर दो एवं एक विश्राम गृह बनवा दो, तो मैं तुम्हारी इच्छा अनुसार पत्नी बन जाऊंगी और यदि तुम ऐसा न कर पाए तो तुम्हारी मृत्यु निश्चित है। गर्व में चूर असुर ने पथों के चारों सोपान सुबह होने से पूर्व पूर्ण कर दिए और विश्राम गृह का निर्माण कर ही रहा था कि महामाया के एक मायावी कुक्कुट(मुर्गे) द्वारा रात्रि समाप्ति की सूचना दी गई, जिससे नरकासुर ने क्रोधित होकर मुर्गे का पीछा किया और ब्रह्मपुत्र के दूसरे छोर पर जाकर उसका वध कर डाला। नरकासुर की मृत्यु के बाद उसका पुत्र भगदत्त कामरूप का राजा बना। भगदत्त का वंश लुप्त हो जाने से कामरूप राज्य छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट गया और सामंत राजा कामरूप पर अपना शासन करने लगा।
मंदिर के बारे में कहा जाता है कि नरकासुर के अत्याचारों से कामाख्या के दर्शन में विघ्न आने लगे। इस बात से क्रोधित होकर महर्षि वशिष्ठ ने इस जगह को श्राप दे दिया, जिससे कामाख्या पीठ लुप्त हो गया। कहा जाता है कि 16 वीं शताब्दी के प्रथमांश में कामरूप प्रदेश के राज्यों में युद्ध होने लगे, जिसमें कूचविहार रियासत के राजा विश्वसिंह जीत गए। युद्ध में विश्वसिंह के भाई खो गए थे और अपने भाई को ढूंढ़ने के लिए वे घूमते-घूमते नीलांचल पर्वत पर पहुंच गए। वहां उन्हें एक वृद्ध महिला दिखाई दी, उस महिला ने राजा को इस जगह के महत्व के बारे में बताया। यहां राजा द्वारा खुदाई करवाने पर कामदेव द्वारा बनबाया हुआ मूलमंदिर निकला। राजा ने उस मंदिर के ऊपर नया मंदिर बनवाया। कालांतर में विश्वसिंह के पुत्र नर नारायण ने अपने छोटे भाई शुक्ल ध्वज द्वारा 1565 ईo में मंदिर का पुनर्निमाण कराया। इस शक्तिपीठ के दर्शन एवं उपासना से भय, भूत आदि नष्ट हो जाते हैं एवं असीम शक्ति की प्राप्ति होती है।