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Kanwar Yatra 2024: आखिर कैसे हुई थी कांवड़ यात्रा की शुरुआत, आखिर कहां जाते हैं जलाभिषेक के लिए शिवभक्त

Sat, 27 Jul 2024 06:27 AM IST
श्वेता सिंह धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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Kanwar yatra 2024 - फोटो : अमर उजाला
Kanwar Yatra 2024: सावन का महीना आरंभ हो चुका है। जैसा कि सब जानते हैं सावन भगवान भोलेनाथ का प्रिय महीना है। 2024 में सावन महीने में निकाली जाने वाली यात्रा 22 जुलाई से शुरू हो चुकी है और सावन शिवरात्रि पर शिवजी पर जलाभिषेक करके इस यात्रा का समापन होगा। सावन के महीने में शिवभक्त कांवड़ यात्रा पर निकलते और पवित्र नदियों से जल लाकर भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक करते हैं। कई लोगों के मन में यह सवाल उत्पन्न होता है हर साल केसरिया रंग के वस्त्र धारण करके शिवभक्त कांवड़ यात्रा क्यों निकलते हैं। इसी क्रम में आइए जानते हैं कि सबसे पहले कांवड़ यात्रा किसने शुरू की थी और क्या हैं कांवड़ यात्रा का इतिहास।

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Kanwar yatra 2024 - फोटो : अमर उजाला
परशुराम थे पहले कांवड़िया 
कुछ लोगों का मानना है कि सबसे पहले भगवान परशुराम ने उत्तरप्रदेश के बागपत के पास बना पूरा महादेव का जलाभिषेक किया था। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार परशुराम गढ़मुक्तेश्वर से कांवड़ में गंगा जल लेकर आए थे और फिर प्राचीन शिवलिंग का जलाभिषेक किया था। कहते हैं तभी से यह परंपरा चली आ रही है।    
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Kanwar yatra 2024 - फोटो : PTI
श्रवण कुमार को भी माना जाता है पहला कांवड़िया 
धार्मिक ग्रंथों की माने तो त्रेता युग में सबसे पहले श्रवण कुमार ने कांवड़ यात्रा की थी। श्रवण कुमार के माता पिता ने तीर्थ यात्रा के दौरान हरिद्वार में गंगा स्नान की इच्छा जाहीर की थी। उनकी इच्छा पूरी करने के लिए श्रवण कुमार  अपने माता पिता को कांवड़ में बैठा कर हरिद्वार में गंगा स्नान कराया। वापस जाते समय गंगाजल लेकर गए यहीं से कांवड़ यात्रा की शुरुआत मानी जाती है। 

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Kanwar yatra 2024 - फोटो : अमर उजाला
श्री राम भी कहलाते हैं पहले कांवड़िया 
अन्य धार्मिक मान्यता के अनुसार सर्वप्रथम कांवड़ यात्रा श्री राम ने शुरू की थी। पौराणिक मान्यताओं की मानें तो बिहार के सुल्तानगंज से अपने कांवड़  में गंगाजल भरकर बाबाधाम के शिवलिंग पर जलाभिषेक किया था। कहते हैं तभी से कांवड़ यात्रा की शुरुआत हुई थी। 
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Kanwar yatra 2024 - फोटो : अमर उजाला
सबसे पहले देवताओं ने किया था जलाभिषेक
एक और प्रचलित मान्यता के अनुसार जब समुद्र मंथन से हलाहल विष निकला था तो सृष्टि को बचाने के लिए भगवान शिव ने विषपान किया था  जिस वजह से उनका कंठ नीला पड़ गया था। भगवान भोलेनाथ के शरीर कि जलन को कम करने के लिए सभी देवताओं ने भगवान शिव पर कई पवित्र नदियों का जल अर्पित किया था जिसमें  गंगाजल भी शामिल था। कहते हैं यहीं से श्रावण मास में कांवड़ यात्रा की शुरुआत हुई थी। 
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मुरादाबाद में जलाभिषेक करते श्रद्धालु - फोटो : संवाद
जलभिषेक के लिए शिवभक्त कहां से लाते हैं जल 
सावन मास में कांवड़िये देश के प्रसिद्ध घाटों से गंगाजल भरकर लाते हैं और भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। मान्यता अनुसार हरिद्वार के हर की पौड़ी में ब्रह्मकुंड के गंगाजल से भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक करना अत्यंत शुभ माना जाता है।  
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