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जिस गीता पर गांधी को था पूरा भरोसा आखिर आइंस्टीन ने उसे लेकर क्यों जताया अफसोस

Wed, 19 Dec 2018 04:21 PM IST
Madhukar Mishra डाॅ. श्रुतिकान्त पाण्डेय
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shrimad bhagwad gita
श्रीमद्भगवद्गीता जिसे सम्मान से गीतोपनिषद् भी कहा जाता है, भारतीय धर्म, दर्शन और अध्यात्म का सार है। जो वेदज्ञान नहीं पा सकते, दर्शन और उपनिषद् का स्वाध्याय नहीं कर सकते; भगवद्गीता उनके लिए अतुल्य सम्बल है। जीवन के उस मोड़ पर जब व्यक्ति स्वयं को द्वन्द्वों तथा चुनौतियों से घिरा हुआ पाता है और कर्तव्य-अकर्तव्य के असमंजस में फंस जाता है; भगवद्गीता उसका हाथ थामती है और मार्गदर्शन करती है।
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गीता से गांधी को मिलता था मुश्किलों का हल
गीता नित्य और सनातन सन्देश है, जिसकी महत्ता इतिहास के तमाम झंझावातों से गुजरती हुई आज तक यथावत् है। जब-जब कोई कर्तव्यनिष्ठ साधक व्यक्तिगत, पारिवारिक, व्यावसायिक या ऐसे किसी विचारव्यूह में उलझता है तो महात्मा गांधी की तरह उसे भी रास्ता इसी उपदेश से मिलता है। गांधीजी का कहना था कि ‘जब कभी संदेह मुझे घेरते हैं और मेरे चेहरे पर निराशा छाने लगती है; मैं क्षितिज पर गीता रूपी एक ही उम्मीद की किरण देखता हूं। इसमें मुझे अवश्य ही एक छन्द मिल जाता है जो मुझे सान्त्वना देता है। तब मैं कष्टों के बीच मुस्कुराने लगता हूँ।’
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श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच कुल 45 मिनट हुई थी बातचीत!
गीता रणभूमि की विकट परिस्थितियों में अध्यात्म और कर्तव्य की प्रेरणा का अनूठा उपदेश है। इतिहास के जानकारों और शोधकर्ताओं के अनुसार 18 फरवरी 5115 ईसापूर्व रविवार को कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच कुल 45 मिनट बातचीत हुई थी, जिसे ‘जय’ नामक काव्य में 72 पद्यों के माध्यम से व्यक्त किया गया था। हालांकि आज इसके विस्तृत संस्करण ‘महाभारत’ में यह ज्ञान 18 अध्यायों और 700 श्लोकों में वर्णित हैं। भीष्मपर्व के अध्याय 25 से 42 में वर्णित इस उपदेश को ‘गीता’, ‘भगवद्गीता’ या ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ नामों से जाना जाता है। यद्यपि इस उपदेश का लक्ष्य अर्जुन को कर्तव्य पालन के लिए उत्प्रेरित करना था; लेकिन अपने उद्भव से आज तक यह अपने उपासकों को जीवन के तमाम संशयों से उबरने का रास्ता सुझाती रही है।

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गीता को लेकर आइंस्टाइन को इस बात का था अफसोस
कलेवर के मामले में गीता महज 700 श्लोकों में सीमित है, लेकिन अपने कथ्य और प्रभाव में यह किसी महाकाव्य से कम नहीं है। इस प्रभाव का वर्णन अल्बर्ट आइंस्टाइन से बेहतर कौन कर सकता है, जिन्हें अफसोस था कि वे अपने यौवन में इस ग्रन्थ के बारे में नहीं जान सके; नहीं तो उनके जीवन की दिशा कुछ और होती। उनका वक्तव्य है कि ‘जब मैं भगवद्गीता पढ़ता हूं तो इसके अलावा सबकुछ मुझे काफी उथला लगता है।’
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सभी आध्यात्मिक परंपराओं में है स्वीकार्य
भगवद्गीता भारत की सभी धार्मिक, दार्शनिक और आध्यात्मिक परम्पराओं में सहज स्वीकार्य है। सांख्य, योग, वेदान्त के तो अनेक रहस्य इसके श्लोकों में समाहित हैं ही; न्याय, वैशेषिक और मीमांसा के सूत्रों की व्याख्या भी यहाँ उपलब्ध हो जाती है। यह वेद से लेकर दर्शनों के सिद्धान्तों और उपनिषद से पुराणों तक की कथावस्तु को अपने में समेटे हुए है। न इसका किसी मत से विरोध है और न किसी सिद्धान्त से वैमनस्य। अपने तार्किक सिद्धान्तों और व्यावहारिक उपदेशों से गीता भारत से बाहर भी मान्य और सम्मानित है। 1785 में चाल्र्स विल्किंस द्वारा पहले अंग्रेजी अनुवाद के बाद से 1982 तक गीता के 75 भाषाओं में 1982 अनुवाद प्रकाशित हो चुके हैं। यही गीता की विश्वव्यापी स्वीकृति का प्रमाण है। विश्व जनमानस को भारतीय दर्शन  और अध्यात्म से परिचित कराने वाले इस काव्य का अध्ययन और अध्यापन आज आॅक्सफोर्ड, हार्वर्ड और बर्कले जैसे अग्रणी विश्वविद्यालयों में किया जा रहा है।
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सत्य से साक्षात्कार कराती गीता
गीता हमें कोई उपदेश या मार्गदर्शन नहीं देती बल्कि जीवन के गहन सत्यों से भी हमारा परिचय कराती है। उन सत्यों से जिन्हें जानकर सब भ्रम, झूठ और अन्धविश्वास निर्मूल हो जाते हैं। इस प्रकार गीता की भूमिका हमारे व्यक्तित्व पर आरोपित असत्यों और भ्रमों से सजग करने तक है, इससे आगे का रास्ता तो स्वयं स्पष्ट हो जाता है। समस्या है कि हम अपने अस्तित्व को वस्तुतः स्वीकार नहीं कर पाते; क्योंकि जो झूठ हमारे व्यक्तित्व पर आरोपित हैं, वे आज के नहीं; जन्म-जन्मान्तर के हैं। उनके निराकरण के लिए केवल आइना दिखाना काफी नहीं रहता, बल्कि अनेक कोणों से सत्य की झलक दिखानी होती है। योगी अरविन्द का अनुभव था कि ‘गीता के वक्तव्यों में सत्य की झलक इतनी स्पष्ट दिखती है कि एक बार इसके सम्पर्क में आने वाला सहज ही इसका कायल हो जाता है।’
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मुश्किलों से पार लगाने का महामंत्र
आत्मस्वरूप से परिचित होने के बाद भी मनुष्य के लिए सद्ज्ञान, सिद्धान्त और विचारधारा पर चल पाना सम्भव नहीं होता। संसार और समाज की परिस्थितियों के कारण अनेक बार सत्य से समझौता करना पड़ता है। अपने से ज्यादा चुनौतियां उनके हित में सामने आती हैं, जिन्हें हम अपनत्व का अंग मानते हैं। ऐसे में कर्तव्यपथ पर चल पाना कभी-कभी तो असम्भव हो जाता है। गीता इसी झिझक और असमंजस से उबरने का उपदेश है। यह उपदेश सिर्फ शाब्दिक नहीं बल्कि व्यावहारिक है। इसमें सलाहों से आगे बढ़कर तर्कों और शाश्वत मूल्यों का उल्लेख है, जिनके प्रकाश में सत्य का पालन सम्भव हो जाता है। इस उपदेश के माध्यम से श्रीकृष्ण केवल कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में हतोत्साहित अर्जुन को ही धर्मयुद्ध में प्रेरित नहीं करते; बल्कि मनुष्यमात्र को अपने कर्तव्यों को जानने और बिना शंका के उनकी पूर्ति में जुट जाने का आह्वान करते हैं। यही श्रीमद्भगवद्गीता की महती विषेशता है।

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परमात्मा का परम प्रसाद जिससे दुख हो जाते हैं दूर
इस एक ही ग्रन्थ में धर्म, कर्म, योग, जीवन, जगत और इनके गहन रहस्यों का अद्भुत समावेश है। यह एकमात्र स्रोत है, जिसमें ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग का अद्भुत समन्वय पाया जाता है। गीता का सबसे बड़ा सन्देश है कि चाहे कुछ भी हो जाए; हमारा विश्वास उस परमात्मसत्ता से डिगना नहीं चाहिए। दुख में या चुनौतियों के बीच परमात्मा की कृपा का जितना आधार हो; सुख में उसकी कृपा के प्रति उससे भी अधिक आभार रहना चाहिए। परमात्मा की सर्वव्यापकता और सर्वशक्तिमत्ता को भुलाकर हम कर्मफल की व्यवस्था को अपने वश में कर लेना चाहते हैं। ऐसा अहंकार सामान्य जनों ही नहीं; महापुरुषों तक को ले डूबता है। भगवद्गीता की लगभग पचास प्रतिशत ऊर्जा अकेले इसी भ्रम को निर्मूल करने में लगी है। भगवान कृष्ण ज्ञान, कर्म और भक्तियोग के समन्वय से जो तथ्य साफ कर देना चाहते हैं उनमें प्रमुख हैं; निजरूप का परिचय, कर्तव्य का बोध, आत्मा की नित्यता, शरीर की परिवर्तनशीलता, कर्म के प्रति दृढता, कर्मफल की परवशता और परमात्मसत्ता के प्रति अनन्य आस्था।
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महापुरुषों ने की हैं अलग-अलग तरीके से व्याख्याएं
गीता के सन्देश को जनसामान्य के लिए बोधगम्य बनाने के लिए आदिशंकराचार्य, रामानुजाचार्य, चैतन्य महाप्रभु, भास्कराचार्य, वल्लभाचार्य, मध्वाचार्य, बालगंगाधर तिलक, महात्मा गांधी, विनोबा भावे जैसे मूर्धन्य विद्वानों ने व्याख्याएं की हैं। इन व्याख्याओं से गीता को आधुनिक सन्दर्भों में प्रासंगिक बनाने में मदद मिली है। गीता के इन भाष्यों से इसके अनुशीलकों को नई प्रेरणा और जीवनदृष्टि मिलती है चाहे वे वैज्ञानिक, मनस्विद, राजनीतिज्ञ, संन्यासी, दार्शनिक, शिक्षक या विद्यार्थी कोई भी हों। परमपिता परमात्मा से प्रार्थना है कि वे हमें इस महान उपदेश से अपने जीवन को सफल और सार्थक बनाने का आशीर्वाद प्रदान करें।

— लेखक एमिटी विश्वविद्यालय, नोएडा में संस्कृत के प्रवक्ता हैं।
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