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Sawan: सावन में क्यों रखा जाता है सोलह सोमवार का व्रत? एक पुजारी के श्राप से शुरू हुई कहानी, पढ़ें पूरी कथा

Fri, 07 Aug 2026 12:43 PM IST
दीक्षा पाठक धर्म डेस्क, अमर उजाला

सार

Sawan Vrat Katha in Hindi: सोलह सोमवार व्रत की यह कथा भगवान शिव और माता पार्वती से जुड़ी है। कथा के अनुसार एक पुजारी को माता पार्वती के श्राप से कोढ़ हो गया, लेकिन श्रद्धा और विधिपूर्वक सोलह सोमवार का व्रत करने से उसे रोग से मुक्ति मिल गई। इसके बाद यही व्रत कई लोगों के जीवन में सुख, समृद्धि और मनोकामनाओं की पूर्ति का कारण बना। 

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भगवान शिव की कृपा पाने का सबसे प्रसिद्ध व्रत - फोटो : AI
धार्मिक मान्यता के अनुसार एक बार भगवान शिव और माता पार्वती भ्रमण करते हुए मृत्युलोक पहुंचे। दोनों अमरावती नाम की सुंदर नगरी में बने भगवान शिव के भव्य मंदिर में ठहर गए। एक दिन माता पार्वती ने प्रसन्न मन से भगवान शिव को चौसर खेलने का प्रस्ताव दिया, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। उसी समय मंदिर का पुजारी पूजा करने पहुंचा। खेल शुरू होने से पहले माता पार्वती ने पुजारी से पूछा कि इस बाजी में जीत किसकी होगी। बिना विचार किए पुजारी ने महादेव की विजय की बात कह दी, लेकिन खेल समाप्त होने पर जीत माता पार्वती की हुई। पुजारी की गलत भविष्यवाणी से माता पार्वती क्रोधित हो गईं। भगवान शिव ने उन्हें शांत करने का प्रयास किया, फिर भी उन्होंने पुजारी को कोढ़ होने का श्राप दे दिया। देखते ही देखते पुजारी गंभीर रोग से पीड़ित हो गया और उसका जीवन दुखों से भर गया।
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भगवान शिव की कृपा पाने का सबसे प्रसिद्ध व्रत - फोटो : adobe
गलत भविष्यवाणी करने पर पूजारी को मिला श्राप
कई दिनों तक कष्ट झेलने के बाद एक दिन देवलोक की अप्सराएं भगवान शिव की पूजा करने मंदिर पहुंचीं। उन्होंने पुजारी की दयनीय स्थिति देखी और उसके दुख का कारण पूछा। पूरी बात जानने के बाद अप्सराओं ने उसे निराश न होने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि सावन का महीना आरंभ हो चुका है और यदि वह पूरे श्रद्धा भाव से सोलह सोमवार का व्रत करेगा तो भगवान शिव की कृपा अवश्य प्राप्त होगी। अप्सराओं ने व्रत की पूरी विधि भी बताई। उन्होंने कहा कि सोमवार के दिन स्वच्छ वस्त्र धारण कर प्रदोष काल में भगवान शिव की पूजा करें। गेहूं के आटे के तीन भाग बनाकर एक भाग भगवान शिव को अर्पित करें और शेष प्रसाद के रूप में भक्तों में बांटें। लगातार सोलह सोमवार तक यही नियम अपनाने के बाद सत्रहवें सोमवार को विशेष रूप से गेहूं, घी और गुड़ का चूरमा बनाकर भगवान शिव को अर्पित करें और सभी में बांटें।
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भगवान शिव की कृपा पाने का सबसे प्रसिद्ध व्रत - फोटो : अमर उजाला
अप्सराओं ने पूजारी को बताया समाधान
पुजारी ने अप्सराओं की बताई विधि के अनुसार पूरे विश्वास और श्रद्धा से सोलह सोमवार का व्रत किया। भगवान शिव की कृपा से उसका कोढ़ समाप्त हो गया और वह फिर से स्वस्थ जीवन जीने लगा। कुछ समय बाद जब भगवान शिव और माता पार्वती दोबारा उसी मंदिर में पहुंचे तो पुजारी को पूर्ण रूप से निरोग देखकर माता पार्वती भी आश्चर्यचकित रह गईं। पुजारी ने उन्हें सोलह सोमवार व्रत की महिमा सुनाई। इसके बाद माता पार्वती ने भी यह व्रत किया और उनकी मनोकामना पूर्ण हुई। उनके रूठे पुत्र स्वामी कार्तिकेय भी पुनः माता के प्रति स्नेह और आज्ञाकारिता से भर गए। यही कथा आगे कई लोगों के जीवन में इस व्रत की महिमा का कारण बनी।

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भगवान शिव की कृपा पाने का सबसे प्रसिद्ध व्रत - फोटो : adobe
कार्तिकेय ने किया सोलह सोमवार का व्रत
कार्तिकेय ने जब अपनी माता से सोलह सोमवार व्रत का महत्व जाना, तो उन्होंने भी इसे पूरी श्रद्धा के साथ करने का संकल्प लिया। उनके मन में एक ही इच्छा थी वर्षों से बिछड़े अपने प्रिय ब्राह्मण मित्र से दोबारा मिलना। मान्यता के अनुसार भगवान शिव की कृपा से उनकी यह मनोकामना पूरी हुई और दोनों मित्रों का मिलन हो गया। जब ब्राह्मण ने इस संयोग का कारण पूछा, तब कार्तिकेय ने सोलह सोमवार व्रत की महिमा बताई। यह सुनकर ब्राह्मण ने भी अपने जीवन की सबसे बड़ी चिंता, विवाह, की कामना लेकर भगवान शिव का यह व्रत शुरू कर दिया।
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भगवान शिव की कृपा पाने का सबसे प्रसिद्ध व्रत - फोटो : adobe
ब्राह्मण की चिंता भी हुई दूर
समय बीता और एक दिन वह ब्राह्मण ऐसे राज्य में पहुंचा, जहां राजकुमारी का स्वयंवर आयोजित था। राजा ने पहले ही घोषणा कर रखी थी कि जिस युवक के गले में सुसज्जित हथिनी वरमाला डालेगी, वही उसकी पुत्री का जीवनसाथी बनेगा। सभा में दूर-दूर से आए राजकुमार अपनी किस्मत आजमा रहे थे, लेकिन भगवान शिव की इच्छा कुछ और ही थी। हथिनी ने सभी को छोड़कर सीधे उस ब्राह्मण के गले में माला डाल दी। राजा ने अपनी प्रतिज्ञा निभाई और पूरे सम्मान के साथ राजकुमारी का विवाह उसी ब्राह्मण से कर दिया। विवाह के बाद जब राजकुमारी ने इस सौभाग्य का रहस्य जाना तो उसने भी पुत्र प्राप्ति की कामना से सोलह सोमवार का व्रत किया। भगवान शिव की कृपा से उसके घर एक तेजस्वी, धर्मपरायण और गुणवान पुत्र का जन्म हुआ।
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भगवान शिव की कृपा पाने का सबसे प्रसिद्ध व्रत - फोटो : adobe

 राज्य प्राप्ति की इच्छा लेकर भगवान शिव की आराधना शुरू की
जब वह बालक बड़ा हुआ तो उसने भी राज्य प्राप्ति की इच्छा लेकर भगवान शिव की आराधना शुरू की। सोलह सोमवार व्रत के प्रभाव से उसका विवाह एक ऐसे वृद्ध राजा की पुत्री से हुआ, जिसकी कोई संतान नहीं थी। कुछ समय बाद राजा के निधन पर वही युवक राज्य का उत्तराधिकारी बना। राजगद्दी मिलने के बाद भी उसने भगवान शिव की पूजा और व्रत का नियम नहीं छोड़ा। लेकिन सत्रहवें सोमवार एक ऐसी घटना घटी, जिसने उसके जीवन की दिशा बदल दी। राजा ने अपनी पत्नी से शिवालय चलने का आग्रह किया, पर उसने स्वयं जाने के बजाय केवल पूजा की सामग्री भिजवा दी। कथा के अनुसार पूजा पूरी होते ही आकाशवाणी हुई कि यदि रानी को महल से अलग नहीं किया गया, तो पूरा राज्य संकट में पड़ जाएगा। भगवान शिव की आज्ञा को सर्वोपरि मानते हुए राजा ने भारी मन से रानी को राज्य छोड़ने का आदेश दे दिया।

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भगवान शिव की कृपा पाने का सबसे प्रसिद्ध व्रत - फोटो : अमर उजाला
रानी नहीं कर पाती थी मदद
महल से निकलने के बाद रानी का हर कदम मानो परीक्षा बन गया। जिस किसी की मदद करना चाहती, वहीं कोई न कोई अनहोनी घट जाती। कभी बूढ़ी महिला की सूत की गठरी आंधी में उड़ गई, कभी तेली के घड़े टूट गए, तो कभी उसके स्पर्श से जल भी अशुद्ध हो गया। लोग उसे अपने दुर्भाग्य का कारण समझने लगे। भटकते-भटकते वह एक आश्रम पहुंची, जहां गुसाईं जी नाम के संत ने उसकी पीड़ा को समझा और उसे बेटी की तरह आश्रय दिया। जब रानी ने अपने जीवन की पूरी घटना सुनाई, तब गुसाईं जी ने बताया कि भगवान शिव की कृपा पाने का सबसे सरल उपाय सोलह सोमवार व्रत ही है। उन्होंने रानी को पूरी श्रद्धा और नियम के साथ यह व्रत करने की सलाह दी। रानी ने वैसा ही किया और सत्रहवें सोमवार विधि पूर्वक पूजा संपन्न की।
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भगवान शिव की कृपा पाने का सबसे प्रसिद्ध व्रत - फोटो : freepik
राजा ने ढूंढी अपनी खोई रानी
उधर भगवान शिव की कृपा से राजा के मन में भी अपनी पत्नी को खोजने की इच्छा जागी। उसने चारों दिशाओं में दूत भेजे।  रानी गुसाईं जी के आश्रम में मिली। स्वयं राजा वहां पहुंचे और अपनी भूल स्वीकार करते हुए रानी को वापस ले जाने की अनुमति मांगी। गुसाईं जी की आज्ञा मिलने के बाद दोनों राजमहल लौट आए। रानी के स्वागत में पूरे राज्य में उत्सव मनाया गया। इसके बाद राजा और रानी ने जीवनभर श्रद्धा के साथ सोलह सोमवार व्रत का पालन किया। कथा के अनुसार अंत समय में दोनों को भगवान शिव की कृपा से मोक्ष की प्राप्ति हुई। यही कारण है कि मान्यता है, जो भक्त श्रद्धा, विश्वास और नियमपूर्वक सोलह सोमवार का व्रत करता है, उसकी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और जीवन में सुख-समृद्धि का वास होता है।

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।

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