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Janmashtami Sthir Lagna: कब करें जन्माष्टमी की पूजा? जानें स्थिर लग्न और निशीथ काल का शुभ समय

Sat, 16 Aug 2025 05:30 AM IST
श्वेता सिंह धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

Krishna Janmashtami 2025: ब्रह्म मुहूर्त आध्यात्मिक साधना और मंत्रजाप के लिए सबसे उत्तम समय माना जाता है। इस साल जन्माष्टमी के दिन ब्रह्म मुहूर्त सुबह 04:24 से 05:07 बजे तक रहेगा। इस समय स्नान कर, भगवान श्रीकृष्ण के सामने व्रत का संकल्प लें और उनके शक्तिशाली मंत्रों का जाप करें। 
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शास्त्रों में इस दिन पूजा के लिए विशेष मुहूर्त बताए गए हैं, जिनमें ब्रह्म मुहूर्त, स्थिर लग्न और निश - फोटो : amar ujala
Janmashtami Pooja Muhurat: भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि पर भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव को पूरे भारत में अत्यंत श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन मध्यरात्रि के समय रोहिणी नक्षत्र में भगवान विष्णु ने अपने आठवें अवतार के रूप में श्रीकृष्ण के रूप में जन्म लिया था। जन्माष्टमी का पर्व न केवल धार्मिक दृष्टि से, बल्कि आध्यात्मिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस अवसर पर भक्तजन व्रत रखते हैं, मंदिरों और घरों में भजन-कीर्तन, झूला सजावट और श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप का श्रृंगार किया जाता है।
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शास्त्रों में इस दिन पूजा के लिए विशेष मुहूर्त बताए गए हैं, जिनमें ब्रह्म मुहूर्त, स्थिर लग्न और निशीथ लग्न प्रमुख हैं। सही समय पर पूजा करने से कई गुना पुण्य फल प्राप्त होता है और भगवान श्रीकृष्ण की कृपा बनी रहती है। इस साल, स्थिर लग्न और निशीथ लग्न के समय बेहद सीमित हैं, जिससे इनकी महत्ता और भी बढ़ जाती है।
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ब्रह्म मुहूर्त में पूजा और मंत्रजाप का महत्व - फोटो : adobe stock
ब्रह्म मुहूर्त में पूजा और मंत्रजाप का महत्व
ब्रह्म मुहूर्त आध्यात्मिक साधना और मंत्रजाप के लिए सबसे उत्तम समय माना जाता है। इस साल जन्माष्टमी के दिन ब्रह्म मुहूर्त सुबह 04:24 से 05:07 बजे तक रहेगा। इस समय स्नान कर, भगवान श्रीकृष्ण के सामने व्रत का संकल्प लें और उनके शक्तिशाली मंत्रों का जाप करें। वातावरण इस समय अत्यंत शुद्ध और शांत होता है, जिससे ध्यान और जप का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है।
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स्थिर लग्न में पूजा करने से जीवन में स्थिरता, समृद्धि और मानसिक शांति प्राप्त होती है। - फोटो : Adobe Stock
स्थिर लग्न मुहूर्त
यदि आप भगवान श्रीकृष्ण की पूजा स्थिर लग्न में करना चाहते हैं, तो इस साल इसका समय रात 10:31 से 11:54 बजे तक रहेगा। स्थिर लग्न में पूजा करने से जीवन में स्थिरता, समृद्धि और मानसिक शांति प्राप्त होती है। इस समय कान्हा जी को सुंदर वस्त्र, मुकुट, मोर पंख, फूलों की माला और बांसुरी के साथ श्रृंगार करें।

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भगवान को माखन, मिश्री, दही और मोदक चढ़ाएं तथा तुलसीदल अवश्य अर्पित करें। - फोटो : Adobe Stock
निशीथ लग्न का महत्व
जन्माष्टमी की पूजा का सबसे महत्वपूर्ण समय निशीथ लग्न होता है, क्योंकि इसी समय भगवान का जन्म हुआ था। इस वर्ष निशीथ लग्न केवल 44 मिनट का है, जो रात 12:04 से 12:47 बजे तक रहेगा। इस समय पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल और मेवा) का भोग अर्पित करना अनिवार्य है। साथ ही, भगवान को माखन, मिश्री, दही और मोदक चढ़ाएं तथा तुलसीदल अवश्य अर्पित करें।
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माखन-मिश्री, फल और मिठाई का भोग लगाएं - फोटो : Adobe Stock
भोग और पूजा विधि
  • सबसे पहले भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप, लड्डू गोपाल, का पंचामृत से अभिषेक करें। पंचामृत दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल और थोड़े मेवों को मिलाकर बनाया जाता है। अभिषेक के समय ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ या ‘कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने’ मंत्र का जप करें। यह अभिषेक शरीर, मन और आत्मा—तीनों को पवित्र कर देता है और घर में सकारात्मक ऊर्जा भर देता है।
  • अभिषेक के बाद भगवान को नए, स्वच्छ और सुंदर वस्त्र पहनाएं। श्रीकृष्ण को पीला रंग विशेष प्रिय है, इसलिए पीले या रेशमी वस्त्र अर्पित करें। इन वस्त्रों को हल्के फूलों की खुशबू या इत्र से सुगंधित किया जा सकता है। वस्त्र पहनाते समय मन में भगवान के प्रति प्रेम और भक्ति का भाव रखें।
  • इसके बाद कान्हा जी का श्रृंगार करें। उनके सिर पर सुंदर मुकुट सजाएं, जिसमें मोर पंख अवश्य हो। मोर पंख भगवान के सौंदर्य और सौभाग्य का प्रतीक है। उनके गले में फूलों की माला पहनाएं और हाथ में बांसुरी सजाएं, जो उनके मधुर संगीत और प्रेम का प्रतीक है।
  • भगवान श्रीकृष्ण को माखन और मिश्री अत्यंत प्रिय हैं। उन्हें ताजे फल, मिठाइयां, मोदक और पंजीरी का भोग भी अर्पित करें। भोग चढ़ाते समय ध्यान रखें कि सभी प्रसाद शुद्ध और सात्विक हों। भोग लगाने के बाद भगवान से प्रार्थना करें कि वे इसे स्वीकार करें और अपनी कृपा बरसाएं।
  • भोग अर्पण के बाद, भक्तों के साथ मिलकर भजन-कीर्तन करें। मृदंग, करताल और घंटियों की ध्वनि के साथ वातावरण में भक्ति का अद्भुत माहौल बनाएं। इसके बाद दीपक और धूप से भगवान की आरती उतारें और आरती के शब्दों में अपना प्रेम उड़ेल दें।
  • पूजा का अंतिम और सबसे आनंददायक भाग होता है भगवान को झूला झुलाना। झूले को फूलों, रंगीन कपड़ों और मोतियों से सजाएं। झूला झुलाते समय ‘नंद के आनंद भयो’ जैसे भजनों का गायन करें। यह क्षण भक्त और भगवान के बीच प्रेम का सबसे मधुर अनुभव होता है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।
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