Jagannath Puri Temple And Rath Yatra History Significance : सृष्टि में 18 विद्याओं की निधि भगवान नारायण और मां श्रीमहालक्ष्मी की नगरी श्रीजगन्नाथ पुरी जो 'दैहिक,दैविक और भौतिक'इन त्रिविध तापों से मुक्ति दिलाकर मोक्ष प्रदान करती है,वहां भगवान जगन्नाथ का रथयात्रा उत्सव आषाढ़ शुक्ल पक्ष द्वितीया एक जुलाई, शुक्रवार को मनाया जाएगा।
मंदिर की कथा
सत्ययुग में परमपिता ब्रह्मा से पांचवीं पीढ़ी में सूर्यवंशी राजा इंद्रदयुम्न हुए जो चक्रवर्ती सम्राट थे। देवर्षि नारद की सलाह पर राजा ने नारायण को प्रसन्न करने के लिए सहस्त्र अश्वमेध यज्ञ किया,तभी नारद जी ने कहा राजन आपका भाग्योदय होने वाला है पूर्ण आहुति करें जिससे यज्ञ सफल हो जाय। राजन श्वेतदीप पर जिन अविनाशी विष्णु का तुमने दर्शन किया उनके शरीर से गिरा हुआ रोम वृक्ष भाव को प्राप्त हो जाता है। वह इस पृथ्वी पर स्थावररूप में भगवान का अंशावतार होता है। भक्त वत्सल भगवान अब उसी वृक्ष रूप में अवतीर्ण हो रहे हैं। तुम्हारे ही शौभाग्य से सर्वपापहारी भगवान यहां सब लोगों के नेत्रों के अतिथि बनेंगे। राजन चार शाखाओं वाले इस वृक्ष रूप में प्रकट हुए भगवान विष्णु को तुम यज्ञ की महावेदी पर स्थापित करो।