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Papankusha Ekadashi 2025: पापांकुशा एकादशी आज, जानें महत्व और प्रभु को प्रसन्न करने की पूजा विधि

Fri, 03 Oct 2025 06:48 AM IST
मेघा कुमारी धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

Papankusha Ekadashi 2025: एकादशी तिथि भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना को समर्पित है, जिस पर उपवास रखने से वह प्रसन्न होते हैं। मान्यता है कि इस दिन श्रीहरि की उपासना करने से साधक को मोक्ष की प्राप्ति होती हैं
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Papankusha Ekadashi 2025 - फोटो : अमर उजाला
Papankusha Ekadashi 2025: आज, 03 अक्टूबर को पापांकुशा एकादशी है।  यह एकादशी तिथि भगवान विष्णु की पूजा और उपासना के लिए अत्यंत पुण्यकारी मानी जाती है। इस दिन व्रत और भक्ति भाव से श्रीहरि विष्णु की आराधना करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है और साधक की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। वर्षभर की सभी एकादशियों में आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी, जिसे पापांकुशा एकादशी कहा जाता है, विशेष महत्व रखती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत को करने से व्यक्ति को समस्त पापों से मुक्ति मिलती है और यमलोक के कष्टों से बचाव होता है। यहां तक कि पूर्वजन्म के दोष भी समाप्त हो जाते हैं। ऐसे में आइए जानते हैं पापांकुशा एकादशी व्रत का महत्व और इसकी पूजन विधि।
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Papankusha Ekadashi 2025 - फोटो : Adobe Stock
कब है पापांकुशा एकादशी 2025 ?
पंचांग के मुताबिक आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का आरंभ 2 अक्तूबर को शाम 7 बजकर 11 मिनट पर होगा। इसका समापन 3 अक्तूबर 2025 को शाम 6 बजकर 33 मिनट पर है। ऐसे में पापांकुशा एकादशी का व्रत 3 अक्तूबर को रखा जाएगा। इसके अलावा 4 अक्तूबर 2025 को सुबह 06:23 मिनट से 8:44 मिनट तक आप व्रत का पारण कर सकते हैं।

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Papankusha Ekadashi 2025 - फोटो : Adobe Stock
पूजा विधि
  • एकादशी पूजा के लिए सबसे पहले चौकी के ऊपर भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर को स्थापित करें।
  • अब भगवान विष्णु को वस्त्र पहनाएं और फूल माला अर्पित करें।
  • इसके बाद पीले फल, फूल, मिठाई भी प्रभु को अर्पित कर दें।
  • अब आप दीपक जलाएं और पंचामृत का भोग विष्णु जी को लगा दें।
  • इसके बाद विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें और उनके नामों का स्मरण करें।
  • फिर अंत में आरती करें और अगले दिन व्रत का पारण करते हुए जरूरतमंद लोगों को दान जरूर दें।
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Papankusha Ekadashi 2025 - फोटो : Adobe Stock
भगवान विष्णु की आरती
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी! जय जगदीश हरे।
भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करे॥

जो ध्यावै फल पावै, दुख बिनसे मन का।
सुख-संपत्ति घर आवै, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय...॥

मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी।
तुम बिनु और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ॐ जय...॥

तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतरयामी॥
पारब्रह्म परेमश्वर, तुम सबके स्वामी॥ ॐ जय...॥

तुम करुणा के सागर तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय...॥

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय! तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय...॥
दीनबंधु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।

अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय...॥

विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय...॥

तन-मन-धन और संपत्ति, सब कुछ है तेरा।
तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा॥ ॐ जय...॥

जगदीश्वरजी की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय...॥

 




डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): 
यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।

 

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