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Pradosh Vrat 2026: 13 या 14 मई कब रखा जाएगा प्रदोष व्रत ? जानें तिथि, मुहूर्त और पूजा विधि

Wed, 06 May 2026 12:35 PM IST
Megha Kumari धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

Pradosh Vrat 2026: प्रदोष व्रत महादेव की कृपा पाने का अवसर होता है। मान्यता है कि, इस दिन सच्चे मन से की गई पूजा से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। साथ ही कष्टों में कमी आती है और मनोकामनाएं पूरी होती हैं। 
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Pradosh Vrat 2026 - फोटो : अमर उजाला
Pradosh Vrat 2026: भोलेनाथ को समर्पित प्रदोष व्रत हर महीने कृष्ण और शुक्ल की त्रयोदशी तिथि पर रखा जाता है। इस तिथि पर मुख्य रूप से प्रदोष काल में पूजा की जाती है। शास्त्रों के अनुसार, प्रदोष काल में की गई पूजा-अर्चना कई गुना फल देती है। इसका प्रभाव जीवन में सुख-समृद्धि और शांति लेकर आता है। साथ ही महादेव की कृपा से जीवन में सफलता के मार्ग, तरक्की और अटके काम को गति मिलती हैं। वर्तमान में ज्येष्ठ माह जारी है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि, इस महीने में प्रदोष व्रत किस दिन किया जाएगा। आइए इसके बारे में जानते हैं।
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Pradosh Vrat 2026 - फोटो : Instagram
कब है प्रदोष व्रत 2026
  • पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि की शुरुआत 14 मई 2026 को सुबह 11 बजकर 20 मिनट से होगी।
  • इसका समापन 15 मई 2026 को सुबह 8 बजकर 31 मिनट पर होगा।
  • प्रदोष काल के आधार पर प्रदोष व्रत 14 मई, 2026 गुरुवार को रखा जाएगा।
  • गुरुवार होने के कारण यह गुरु प्रदोष व्रत के नाम से जाना जाएगा।
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Pradosh Vrat 2026 - फोटो : freepik
प्रदोष व्रत की सरल पूजा विधि
  • पूजा के लिए सबसे पहले शिवलिंग का गंगाजल और कच्चे दूध से अभिषेक करें। यह भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है।
  • इसके बाद शिवलिंग पर 11 बेलपत्र और कुछ फूल चढ़ाएं।
  • अब आप भांग, धतूरा, अनाज आदि अर्पित करें और श्रद्धा से महादेव का ध्यान करें।
  • ॐ नमः शिवाय मंत्र का जाप करें। इससे मन शांत और शिव कृपा मिलती है।
  • दीपक जलाकर भगवान शिव और माता पार्वती का ध्यान करें।
  • गुरु प्रदोष व्रत की कथा पढ़ें।
  • अंत में आरती करेंऔर परिवार की सुख-शांति की कामना करें।
 

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Pradosh Vrat 2026 - फोटो : adobe
प्रदोष व्रत आरती 
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा ॥
ॐ जय शिव ओंकारा...॥

एकानन चतुरानन पंचानन राजे ।
हंसासन गरूड़ासन वृषवाहन साजे ॥
ॐ जय शिव ओंकारा...॥

दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे ।\
त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे ॥
ॐ जय शिव ओंकारा...॥

अक्षमाला वनमाला, मुण्डमाला धारी ।
चंदन मृगमद सोहै, भाले शशिधारी ॥
ॐ जय शिव ओंकारा...॥

श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे ।
सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे ॥
ॐ जय शिव ओंकारा...॥

कर के मध्य कमंडल चक्र त्रिशूलधारी ।
सुखकारी दुखहारी जगपालन कारी ॥
ॐ जय शिव ओंकारा...॥

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका ।
प्रणवाक्षर में शोभित ये तीनों एका ॥
ॐ जय शिव ओंकारा...॥

त्रिगुणस्वामी जी की आरती जो कोइ नर गावे ।
कहत शिवानंद स्वामी सुख संपति पावे ॥
ॐ जय शिव ओंकारा...॥

लक्ष्मी व सावित्री पार्वती संगा ।
पार्वती अर्द्धांगी, शिवलहरी गंगा ॥
ॐ जय शिव ओंकारा...॥

पर्वत सोहैं पार्वती, शंकर कैलासा ।
भांग धतूर का भोजन, भस्मी में वासा ॥
ॐ जय शिव ओंकारा...॥

जटा में गंग बहत है, गल मुण्डन माला ।
शेष नाग लिपटावत, ओढ़त मृगछाला ॥
जय शिव ओंकारा...॥

काशी में विराजे विश्वनाथ, नंदी ब्रह्मचारी ।
नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी ॥
ॐ जय शिव ओंकारा...॥

ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा ॥
 


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।

 

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